सूरà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥à¤¤ के समय दिलà¥à¤²à¥€ के जामा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ का दौरा करना à¤à¤• अदà¥à¤à¥à¤¤ शांति देता है, इससे कोई फरà¥à¤• नहीं पड़ता कि यह सरà¥à¤¦à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ या गरà¥à¤®à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का मौसम है। बाद में, चांदनी चौक की à¤à¥€à¤¡à¤¼ में कबाब की पà¥à¤²à¥‡à¤Ÿ पकड़ने के लिठचलना हमेशा परेशानी के लायक होता है। लेकिन पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ दिलà¥à¤²à¥€ में जीवन की यही खूबसूरती है।
कà¥à¤¯à¤¾ आप जानते हैं कि जामा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ की à¤à¤• छोटी पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•ृति है, जो मूल मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ के ठीक पास है। यह दरियागंज में 18 वीं शताबà¥à¤¦à¥€ की मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ है और इसका नाम औरंगजेब की बेटी के नाम पर रखा गया था। आइठजानते हैं इसके इतिहास के बारे में।
दरियागंज का जीनत-उल-मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ 18वीं सदी की à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• रचना है जो दिलà¥à¤²à¥€ की जामा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ से काफी हद तक मिलती जà¥à¤²à¤¤à¥€ है। लाल बलà¥à¤† पतà¥à¤¥à¤° से शà¥à¤°à¥‚ होकर काले पतà¥à¤¥à¤° की धारियों और कबà¥à¤°à¥‹à¤‚ के साथ तीन संगमरमर के गà¥à¤‚बददार मेहराब तक, यह आसानी से जामा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ के छोटे संसà¥à¤•रण के रूप में दिखता है। यदि आप मà¥à¤–à¥à¤¯ दà¥à¤µà¤¾à¤° से पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करते हैं, तो आप à¤à¤• उलà¥à¤Ÿà¥‡ कमल के डिजाइन को देखेंगे।
जीनत-उल-मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ में सात मेहराब हैं, जिनमें से à¤à¤• केंदà¥à¤° में है। मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ की माप 150×60 फीट है, जिसमें सात सà¥à¤•ैलपà¥à¤¡ धनà¥à¤·à¤¾à¤•ार पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ दà¥à¤µà¤¾à¤° हैं जो पूरà¥à¤µ की ओर हैं। दà¥à¤°à¥à¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ से, समय के साथ दरियागंज में इस मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ की महिमा ने अपनी चमक खो दी है।
यह समय 1707 था जब इस दरियागंज की मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ को औरंगजेब और उनकी दिलरास बेगम की दूसरी बेटी राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ जीनत-उन-निशा का नाम दिया गया था। तब से इसका नाम जीनत-उल-मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ रखा गया है। राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ के नाम का मतलब महिलाओं के बीच सà¥à¤‚दरता से है। इस मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ के नाम का मतलब मसà¥à¤œà¤¿à¤¦à¥‹à¤‚ के बीच सà¥à¤‚दरता था। à¤à¤¸à¤¾ लगता है कि वह वासà¥à¤¤à¤µ में à¤à¤• सà¥à¤‚दर मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ के रूप में खà¥à¤¦ का विसà¥à¤¤à¤¾à¤° चाहती थी।
इस मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ का à¤à¤• और नाम है, 'घटा मसà¥à¤œà¤¿à¤¦' जिसका हिंदी में अरà¥à¤¥ बादल मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ से है। यह इस तथà¥à¤¯ से है कि गà¥à¤‚बद में काले और सफेद पटà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ हैं, जो मानसून के बादलों से मिलती जà¥à¤²à¤¤à¥€ हैं। इतना सà¥à¤‚दर दृशà¥à¤¯ तब होगा जब वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤• मानसून के बादल इस सà¥à¤®à¤¾à¤°à¤• पर लà¥à¤¢à¤¼à¤•ेंगे।
1847 में इसे बà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ अधिकारियों के लिठबà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ शासन के तहत à¤à¤• बेकरी में बदल दिया गया था। वासà¥à¤¤à¤µ में इस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ का उपयोग कà¥à¤› समय के लिठà¤à¤• सà¥à¤•ूल के रूप में à¤à¥€ किया जाता था। गरीबों के बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को उरà¥à¤¦à¥‚ और फारसी à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤à¤‚ सिखाई जाती थीं। राणा सफवी ने अपनी किताब 'शाहजहानाबाद: द लिविंग सिटी ऑफ ओलà¥à¤¡ दिलà¥à¤²à¥€' में लिखा है कि राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ जीनत-उन-निशा को जीनत-उल-मसà¥à¤œà¤¿à¤¦ के उतà¥à¤¤à¤° में दफनाया गया था, जिसे बाद में अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥‹à¤‚ ने धà¥à¤µà¤¸à¥à¤¤ कर दिया था।
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