कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ कीजिà¤: सिनेमा हॉल में दरà¥à¤¶à¤• सà¥à¤•à¥à¤°à¥€à¤¨ पर 'इंटरवल' आने से ठीक पहले जलपान के लिठअपनी सीट छोड़ने के लिठबस जाने को हैं। मगर वे à¤à¤¸à¤¾ नहीं करते। वे मंतà¥à¤°à¤®à¥à¤—à¥à¤§ होकर बैठजाते हैं कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि मनà¥à¤¨à¤¾ डे की उदास आवाज 'कसमे वादे पà¥à¤¯à¤¾à¤° वफा...' से ऑडिटोरियम को à¤à¤° देती है। यह फिलà¥à¤® थी उपकार (1967) और दरà¥à¤¶à¤•ों को बांधे रखने की उपलबà¥à¤§à¤¿ किसी और ने नहीं बलà¥à¤•ि लेखक मनोज कà¥à¤®à¤¾à¤° ने हासिल की, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने इस फिलà¥à¤® के साथ अपने निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤¨ की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ की।
संगीतकार आनंदजी विरजी शाह (कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤œà¥€-आनंदजी) इसकी महानता का शà¥à¤°à¥‡à¤¯ कà¥à¤®à¤¾à¤° की कहानी और चरितà¥à¤° को देते हैं। कà¥à¤®à¤¾à¤° बैकगà¥à¤°à¤¾à¤‰à¤‚ड सà¥à¤•ोर में à¤à¥€ गहराई से शामिल थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¤• बार कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤œà¥€-आनंदजी को à¤à¤• सलाह दी थी जिसे उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने पूरे करियर में अपनाया कि हीरो, हीरोइन और खलनायक के लिठअलग संगीत होना चाहिà¤à¥¤
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤• चंदà¥à¤°à¤¾ बारोट को सà¥à¤à¤¾à¤µ दिया कि वे कथा की गंà¤à¥€à¤°à¤¤à¤¾ को तोड़ने के लिठगीत को शामिल करें। उनके पास à¤à¤¸à¥€ कà¥à¤¶à¤¾à¤—à¥à¤° बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ थी। जैसा कि आनंदजी ने à¤à¤• बार à¤à¤• साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार में पà¥à¤·à¥à¤Ÿà¤¿ की थी-मनोज कà¥à¤®à¤¾à¤° à¤à¤• शानदार निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤• थे। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ संगीत सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ का शौक था। वे कहानियों को संपादित करने और लिखने में à¤à¥€ कà¥à¤¶à¤² थे और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ à¤à¤¾à¤°à¤¤ के इतिहास का गहरा जà¥à¤žà¤¾à¤¨ था।
अपने शानदार करियर के दौरान, बहà¥à¤®à¥à¤–ी पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾ वाले इस अà¤à¤¿à¤¨à¥‡à¤¤à¤¾ ने साबित कर दिया कि वे सिरà¥à¤« सिनेमा में अà¤à¤¿à¤¨à¤¯ करने को लेकर ही नहीं सोचते बलà¥à¤•ि इसे सिरà¥à¤« मनोरंजन करने के लिठनहीं, बलà¥à¤•ि लोगों को जगाने के लिठदृढ़ विशà¥à¤µà¤¾à¤¸ के साथ बनाते थे।
à¤à¤• मिशन के साथ फिलà¥à¤® निरà¥à¤®à¤¾à¤£
हरि कृषà¥à¤£ गिरि गोसà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ के रूप में जनà¥à¤®à¥‡ मनोज कà¥à¤®à¤¾à¤° ने फिलà¥à¤® शबनम में दिलीप कà¥à¤®à¤¾à¤° के किरदार को शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾à¤‚जलि देते हà¥à¤ अपना सà¥à¤•à¥à¤°à¥€à¤¨ नाम अपनाया। उनका करियर à¤à¤¸à¥€ फिलà¥à¤®à¥‹à¤‚ को बनाने के तरीके और अरà¥à¤¥ से परिà¤à¤¾à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤† जो संघरà¥à¤·à¤°à¤¤ लेकिन उमà¥à¤®à¥€à¤¦ से à¤à¤°à¥‡ à¤à¤¾à¤°à¤¤ की आतà¥à¤®à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥€ हैं।
अपने निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤¨ की पहली फिलà¥à¤® उपकार ने सेलà¥à¤¯à¥à¤²à¤¾à¤‡à¤¡ को नागरिक करà¥à¤¤à¤µà¥à¤¯ के साथ जोड़ा। कà¥à¤®à¤¾à¤° ने à¤à¤• सारà¥à¤¥à¤• फिलà¥à¤® निरà¥à¤®à¤¾à¤¤à¤¾ के रूप में अपनी जगह पकà¥à¤•ी की। रोटी कपड़ा और मकान (1974) में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤¦à¥€ मानवीय जरूरतों-à¤à¥‹à¤œà¤¨, कपड़े और आशà¥à¤°à¤¯-को à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ ईमानदारी के साथ चितà¥à¤°à¤¿à¤¤ किया जो गरीबी और मोहà¤à¤‚ग से जूठरहे देश के साथ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿à¤¤ हà¥à¤ˆà¥¤
उनकी महान कृति, कà¥à¤°à¤¾à¤‚ति (1981) पर विचार किठबिना उनके करियर पर à¤à¤• नजर अधूरी रहेगी। कà¥à¤°à¤¾à¤‚ति यानी दिलीप कà¥à¤®à¤¾à¤° और हेमा मालिनी जैसे दिगà¥à¤—जों की विशेषता वाला à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• महाकावà¥à¤¯, à¤à¤¾à¤°à¤¤ के सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के अशांत दशकों तक फैला à¤à¤• सिनेमाई आंदोलन था। कà¥à¤®à¤¾à¤° की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ ने कई पीढ़ियों के कलाकारों को à¤à¤• साथ किया और पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤•ता किंतॠवà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• कथा पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ की।
कà¥à¤®à¤¾à¤° ने न केवल इसका निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤¨ किया, बलà¥à¤•ि शानदार दृशà¥à¤¯, ओपेरा जैसी à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤à¤‚, जोश से à¤à¤°à¤¾ बैकगà¥à¤°à¤¾à¤‰à¤‚ड सà¥à¤•ोर और à¤à¤• संदेश दिया कि आजादी दी नहीं जाती-उसे अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ किया जाता है। अपने समय की सबसे महंगी और सबसे अधिक कमाई करने वाली फिलà¥à¤®à¥‹à¤‚ में से à¤à¤• के रूप में कà¥à¤°à¤¾à¤‚ति वà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤¸à¤¾à¤¯à¤¿à¤• सफलता और राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¦à¥€ कहानी कहने का à¤à¤• दà¥à¤°à¥à¤²à¤ संयोजन था। इसने कà¥à¤®à¤¾à¤° की छवि को न केवल सà¥à¤•à¥à¤°à¥€à¤¨ पर à¤à¤¾à¤°à¤¤ के रूप में बलà¥à¤•ि à¤à¤• à¤à¤¸à¥‡ फिलà¥à¤® निरà¥à¤®à¤¾à¤¤à¤¾ के रूप में à¤à¥€ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया जो राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ सà¥à¤¤à¤° पर à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं को उà¤à¤¾à¤° सकता था।
उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯à¤ªà¥‚रà¥à¤£ लेखनी
शहीद (1965) में कà¥à¤®à¤¾à¤° दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ à¤à¤—त सिंह का किरदार संवेदनशील और उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤ªà¥‚रà¥à¤£ था, जिसके लिठउनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पटकथा लेखक के रूप में अपना पहला राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ार मिला। à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ार जिसे उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने निसà¥à¤µà¤¾à¤°à¥à¤¥ à¤à¤¾à¤µ से à¤à¤—त सिंह के परिवार को दान कर दिया। अगर उपकार में देशà¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ और मारà¥à¤®à¤¿à¤•ता को जगह मिली, तो पूरब और पशà¥à¤šà¤¿à¤® (1970) ने पहचान, गौरव और परंपरा तथा आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता के बीच तनाव की खोज की।
देशà¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ से परे, उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने निरà¥à¤®à¤¾à¤¤à¤¾-निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤• और अà¤à¤¿à¤¨à¥‡à¤¤à¤¾ के रूप में बेहद à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• शोर (1972) à¤à¥€ बनाई। पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ लेखन उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखे गठसंवादों तक फैला हà¥à¤† था- देशà¤à¤•à¥à¤¤à¤¿, सामाजिक नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ और à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• गहराई के लिठसमान उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹ से à¤à¤°à¥€ पंकà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚। तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡ पास धरà¥à¤® है... हमारे पास करà¥à¤®à¥¤ तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡ पास मंदिर है... हमारे पास इंसान। à¤à¤°à¤¤ पूरब और पशà¥à¤šà¤¿à¤® में कहते हैं, जो अंध धारà¥à¤®à¤¿à¤• पà¥à¤°à¤¥à¤¾à¤“ं और मानवतावादी मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के बीच संघरà¥à¤· को उजागर करता है।
उनकी कलम से निकले शबà¥à¤¦ देशà¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ के नाटकों तक ही सीमित नहीं थे। शोर में कोमल à¤à¥‡à¤¦à¥à¤¯à¤¤à¤¾ हो या रोटी कपड़ा और मकान में मजदूर वरà¥à¤— का मोहà¤à¤‚ग, जिसमें 'ये रोटी à¤à¥€ कà¥à¤¯à¤¾ रोटी है जो इंसान का जमीर खा जाती है?' उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ और गरिमा की कीमत पर सवाल उठाà¤à¥¤ सà¤à¥€ विधाओं में चाहे वह à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• महाकावà¥à¤¯ हों, à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• नाटक हों या सामाजिक-राजनीतिक आखà¥à¤¯à¤¾à¤¨-मनोज कà¥à¤®à¤¾à¤° के संवाद-लेखन अपनी गहराई, उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ और बेबाक आवाज में à¤à¤• समान रहे। 4 अपà¥à¤°à¥ˆà¤², 2025 को 87 वरà¥à¤· की आयॠमें उनका निधन à¤à¤• यà¥à¤— का अंत था लेकिन उनकी विरासत का नहीं।
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