हर साल गà¥à¤°à¥ पूरà¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ पर शमà¥à¤®à¥€ कपूर और उनकी पतà¥à¤¨à¥€ नीला देवी अपने गà¥à¤°à¥ का आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ लेने के लिठवृनà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¨ जाते थे। उनके गà¥à¤°à¥ इस अवसर पर हिमालय में अपने आशà¥à¤°à¤® से आते थे। 1980 में सà¥à¤¬à¤¹ लगà¤à¤— 4 बजे पति-पतà¥à¤¨à¥€ अपने गà¥à¤°à¥ से मिलने जा रहे थे तà¤à¥€ साइकिल पर सवार à¤à¤• लड़के ने उनके रिकà¥à¤¶à¥‡ को रोक दिया और दिगà¥à¤—ज अà¤à¤¿à¤¨à¥‡à¤¤à¤¾ से दà¥à¤–ी होकर कहा- शमà¥à¤®à¥€ साहब आपकी आवाज चली गई (शमà¥à¤®à¥€ साहब, आपकी आवाज) है। शमà¥à¤®à¥€ हैरान थे कि लड़के ने सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ किया कि वह मोहमà¥à¤®à¤¦ रफी का जिकà¥à¤° कर रहा था। उनà¥à¤¹à¥‡ 31 जà¥à¤²à¤¾à¤ˆ को दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। यह सà¥à¤¨à¤¤à¥‡ ही दà¥à¤–ी शमà¥à¤®à¥€ कपूर तà¥à¤°à¤‚त फूट-फूट कर रोने लगे। मोहमà¥à¤®à¤¦ रफी अकादमी का अनावरण करते हà¥à¤ गायक की तीसरी बरसी पर शमà¥à¤®à¥€ ने सà¥à¤µà¥€à¤•ार किया कि उनà¥à¤¹à¥‡ आजीवन अफसोस रहेगा कि वह मà¥à¤‚बई से दूर थे, इसलिठउस वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को अलविदा न कह सके जिसने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ इतना कà¥à¤› दिया था। रफी और शमà¥à¤®à¥€ का जà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤µ 1953 से था।
रफी का जनà¥à¤® 24 दिसंबर, 1924 को अमृतसर के पास कोटला सà¥à¤²à¥à¤¤à¤¾à¤¨ सिंह गांव में à¤à¤• रूढ़िवादी पंजाबी जाट मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® परिवार में हà¥à¤† था। उनकी सà¥à¤•ूली शिकà¥à¤·à¤¾ घर पर ही हà¥à¤ˆ लेकिन पढ़ाई में उनकी रà¥à¤šà¤¿ नहीं थी। संगीत में थी। इसके कारण अबà¥à¤¬à¤¾à¤œà¤¾à¤¨ से बार-बार डांट खानी पड़ती थी और पिटाई à¤à¥€ होती थी। लेकिन लड़का उस फकीर के पीछे-पीछे चलता रहा जो हर सà¥à¤¬à¤¹ उनके गांव में आता था, उसके पीछे-पीछे जप करता था, और फीको उपनाम अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ कर चà¥à¤•ा था।
वरà¥à¤· 1935 में उनके पिता हाजी अली मोहमà¥à¤®à¤¦ लाहौर चले गये और वहां नाई की दà¥à¤•ान खोली। अंततः अपने बेटे की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾ को पहचानते हà¥à¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने रफी ​​को शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯ संगीत का पà¥à¤°à¤¶à¤¿à¤•à¥à¤·à¤£ लेने के लिठकिराना घराने के उसà¥à¤¤à¤¾à¤¦ अबà¥à¤¦à¥à¤² वहीद खान के पास à¤à¥‡à¤œà¤¾à¥¤ वह लड़का जलà¥à¤¦ ही सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ सà¥à¤¤à¤° पर à¤à¤• लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ गायक बन गया और जब केà¤à¤² सहगल पैन-इंडिया पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨à¥€ के लिठलाहौर आठऔर माइक खराब हो गया तो बिजली वापस आने तक रफी को कà¥à¤› गानों के साथ दरà¥à¤¶à¤•ों का मनोरंजन करने के लिठमंच पर धकेल दिया गया। 1980 में सà¥à¤Ÿà¤¾à¤° à¤à¤‚ड सà¥à¤Ÿà¤¾à¤‡à¤² पतà¥à¤°à¤¿à¤•ा को दिठà¤à¤• इंटरवà¥à¤¯à¥‚ में रफी ने सà¥à¤µà¥€à¤•ार किया कि उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ के बाद सहगल ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ दिया और à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯à¤µà¤¾à¤£à¥€ की कि à¤à¤• दिन वह बहà¥à¤¤ लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ गायक बनेंगे।
दिल को छू लेने वाली मà¥à¤¸à¥à¤•ान और बड़े दिल वाले à¤à¤• साधारण वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ रफी को शायद ही कà¤à¥€ गà¥à¤¸à¥à¤¸à¤¾ आता था। लेकिन साठके दशक में लता मंगेशकर के साथ à¤à¤• अपà¥à¤°à¤¿à¤¯ वाकयà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤† था जब उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने (लता) तलत महमूद, मà¥à¤•ेश, मनà¥à¤¨à¤¾ डे और किशोर कà¥à¤®à¤¾à¤° के साथ मिलकर मांग की थी उन सà¤à¥€ गायकों के लिठरॉयलà¥à¤Ÿà¥€ मिले जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ केवल à¤à¤•मà¥à¤¶à¥à¤¤ à¤à¥à¤—तान मिल रहा था। रिकॉरà¥à¤¡à¤¿à¤‚ग कंपनियों ने इसकी जिमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€ निरà¥à¤®à¤¾à¤¤à¤¾à¤“ं पर डाल दी और मामला बढ़ गया।
इस पà¥à¤°à¤•रण ने रफी को परेशान कर दिया कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि उनके संगीत हमेशा à¤à¤• दैवीय खोज थी, पैसा कà¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤•ता नहीं थी। उनका मानना ​​था कि à¤à¤• बार गाना रिकॉरà¥à¤¡ हो जाठऔर गायक को à¤à¥à¤—तान हो जाठतो किसी विषय पर आगे चरà¥à¤šà¤¾ नहीं होनी चाहिà¤à¥¤ 1963 में à¤à¤• मीटिंग में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने लता पर निशाना साधते हà¥à¤ गà¥à¤¸à¥à¤¸à¥‡ में कहा कि मैं आपके साथ फिर कà¤à¥€ नहीं गाऊंगा। लता ने à¤à¥€ जवाब में सà¤à¥€ संगीत निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤•ों को बà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤¾ और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सूचित किया कि वह रफी के साथ रिकॉरà¥à¤¡ नहीं करेंगी। आखिरकार, रफी ने बाद में लता को à¤à¤• पतà¥à¤° à¤à¥‡à¤œà¤¾ जिसमें सà¥à¤µà¥€à¤•ार किया गया कि उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जलà¥à¤¦à¤¬à¤¾à¤œà¥€ में बात की थी और 1967 में मà¥à¤‚बई में à¤à¤¸à¤¡à¥€ बरà¥à¤®à¤¨ नाइट में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने फिलà¥à¤® जà¥à¤µà¥‡à¤² थीफ का यà¥à¤—ल गीत- दिल पà¥à¤•ारे आरे... गाया, और सब ठीक हो गया।
अपने शताबà¥à¤¦à¥€ वरà¥à¤· में रफी की पसंद चà¥à¤¨à¤¨à¤¾ कठिन है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि वह अपने पीछे बहà¥à¤¤ सारे अमूलà¥à¤¯ रतà¥à¤¨ छोड़ गठहैं। उनमें से à¤à¤• है बैजू बावरा का गाना ओ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के रखवाले..."। उदà¥à¤¯à¥‹à¤— जगत की कहानियों के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° नौशाद ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी गायन सीमा इस हद तक बढ़ा दी थी कि à¤à¤• पखवाड़े से अधिक समय तक रिहरà¥à¤¸à¤² करने के बावजूद रिकॉरà¥à¤¡à¤¿à¤‚ग के दौरान रफी को खांसी आ रही थी और उसके बाद कई दिनों तक वह गा नहीं सके। कोई नहीं जानता कि इन अफवाहों में कितनी सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆ है लेकिन संगीतकार ने बताया कि जब उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कà¥à¤› साल बाद गाना दोबारा रिकॉरà¥à¤¡ किया तो रफी ने इसे दो सà¥à¤° ऊपर ले लिया।
इसके अलावा, नौशाद ने अखबारों में पढ़ा कि जब मौत की सजा पाठà¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ से उसकी आखिरी इचà¥à¤›à¤¾ पूछी गई तो उसने फांसी पर चढ़ने से पहले अनà¥à¤°à¥‹à¤§ किया कि वे उसके लिठओ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के रखवाले... बजाà¤à¤‚। बस यही है मोहमà¥à¤®à¤¦ रफी के जादू का सारांश है। रफी की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤à¤¾ ईशà¥à¤µà¤° पà¥à¤°à¤¦à¤¤à¥à¤¤ थी।
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