वायॠपà¥à¤°à¤¦à¥‚षण के मामले में à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ में पहले से ही खराब है। अब à¤à¤• नई रिसरà¥à¤š रिपोरà¥à¤Ÿ में दावा किया गया है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤ में हर 1,000 शिशà¥à¤“ं और बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में से 27 की मौत खाना पकाने के लिठइसà¥à¤¤à¥‡à¤®à¤¾à¤² होने वाले गंदे ईंधन के संपरà¥à¤• में आने से होती है। यह रिपोरà¥à¤Ÿ कॉरà¥à¤¨à¥‡à¤² यूनिवरà¥à¤¸à¤¿à¤Ÿà¥€ की तरफ से किठगठशोध के आधार पर तैयार की गई है।
2023 में जारी छठी वारà¥à¤·à¤¿à¤• विशà¥à¤µ वायॠगà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾ रिपोरà¥à¤Ÿ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°, वायॠपà¥à¤°à¤¦à¥‚षण के लिहाज से दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के सबसे खराब 100 शहरों में से 83 à¤à¤¾à¤°à¤¤ में हैं। इन सà¤à¥€ में विशà¥à¤µ सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ संगठन के वायॠगà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾ दिशानिरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥‹à¤‚ की तà¥à¤²à¤¨à¤¾ में पà¥à¤°à¤¦à¥‚षण का सà¥à¤¤à¤° 10 गà¥à¤¨à¤¾ से à¤à¥€ अधिक था।
परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ संरकà¥à¤·à¤£ à¤à¤œà¥‡à¤‚सी और अनà¥à¤¯ संगठनों का सà¥à¤à¤¾à¤µ है कि बाहरी वायॠपà¥à¤°à¤¦à¥‚षण के साथ ही घरों के अंदर हवा की खराब कà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤Ÿà¥€ बेहद घातक साबित हो रही है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ जगहों पर जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾à¤¤à¤° लोग अपना अधिकांश समय बिताते हैं।
चारà¥à¤²à¥à¤¸ à¤à¤š. डायसन सà¥à¤•ूल ऑफ à¤à¤ªà¥à¤²à¤¾à¤‡à¤¡ इकोनॉमिकà¥à¤¸ à¤à¤‚ड मैनेजमेंट के पà¥à¤°à¥‹à¤«à¥‡à¤¸à¤° और 'कà¥à¤•िंग फà¥à¤¯à¥‚ल चॉइस à¤à¤‚ड चाइलà¥à¤¡ मोरà¥à¤Ÿà¥‡à¤²à¤¿à¤Ÿà¥€ इन इंडिया' के पहले लेखक अरà¥à¤¨à¤¬ बसॠने बताया कि यह पहला रिसरà¥à¤š पेपर है जो घरों के अंदर बायोमास ईंधनों के उपयोग से होने वाले नà¥à¤•सान और यà¥à¤µà¤¾à¤“ं को जोखिम का मजबूत अनà¥à¤®à¤¾à¤¨ देता है।
हाल ही में जरà¥à¤¨à¤² ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर à¤à¤‚ड ऑरà¥à¤—नाइजेशन में पà¥à¤°à¤•ाशित इस रिसरà¥à¤š के बारे में बसॠने बताया कि हमने 25 वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ के राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ जनसांखà¥à¤¯à¤¿à¤•ीय à¤à¤µà¤‚ सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ सरà¥à¤µà¥‡à¤•à¥à¤·à¤£ डेटा का उपयोग करके ये निषà¥à¤•रà¥à¤· निकाला है। इस वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• डेटा की मदद से हम घरों में उपयोग होने वाले सà¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ार के पà¥à¤°à¤¦à¥‚षणकारी ईंधन की पहचान करने में सकà¥à¤·à¤® हà¥à¤ हैं।
शोधकरà¥à¤¤à¤¾à¤“ं ने 1992 से 2016 तक के घरेलू सरà¥à¤µà¥‡à¤•à¥à¤·à¤£ डेटा के आकलन करके पाया कि खाना पकाने के लिठगंदे ईंधन के इसà¥à¤¤à¥‡à¤®à¤¾à¤² का à¤à¤• महीने से कम उमà¥à¤° के शिशà¥à¤“ं पर सबसे बà¥à¤°à¤¾ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ पड़ता है। इस उमà¥à¤° में फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं और शिशॠअपनी मां के सबसे करीब रहते हैं, जो रसोई में काफी वकà¥à¤¤ बिताती हैं।
बसॠने कहा कि दिलचसà¥à¤ª बात यह है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ घरों में लड़कों की तà¥à¤²à¤¨à¤¾ में यà¥à¤µà¤¾ लड़कियों में मृतà¥à¤¯à¥ दर बहà¥à¤¤ अधिक है। à¤à¤¸à¤¾ इसलिठनहीं कि लड़कियां पà¥à¤°à¤¦à¥‚षण से संबंधित सांस संबंधी बीमारियों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अधिक संवेदनशील होती हैं।
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कहा कि इसका à¤à¤• कारण ये à¤à¥€ है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤ में आमतौर पर बेटों को पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤•ता दी जाती है और जब बेटी बीमार पड़ती है या खांसती है तो उसके इलाज पर कम धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ दिया जाता है। बसॠने कहा कि सà¥à¤µà¤šà¥à¤› ईंधन अपनाने से न सिरà¥à¤« बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ पर सकारातà¥à¤®à¤• पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ पड़ेगा बलà¥à¤•ि बेटियों की इस उपेकà¥à¤·à¤¾ को à¤à¥€ दूर किया जा सकता है।
डबà¥à¤²à¥à¤¯à¥‚à¤à¤šà¤“ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°, दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की लगà¤à¤— à¤à¤• तिहाई आबादी खà¥à¤²à¥€ आग पर या लकड़ी, पशॠगोबर और फसल अपशिषà¥à¤Ÿ जैसे बायोमास ईंधन से खाना पकाती है। इसकी वजह से दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ à¤à¤° में हर साल अनà¥à¤®à¤¾à¤¨à¤¿à¤¤ 32 करोड लोगों की मौत होती है।
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