गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ में ततà¥à¤•ालीन बà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ उपनिवेश में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ के पहली बार आगमन की 186वीं वरà¥à¤·à¤—ांठका समारोह धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान सà¥à¤µà¤°à¥à¤—ीय डॉ. येसॠपà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ और अशोक रामसरन को विशेष समà¥à¤®à¤¾à¤¨ दिया गया।
डॉ. पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ और रामसरन दोनों ही à¤à¤¾à¤°à¤¤ सरकार की तरफ से पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ित पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¸à¥€ समà¥à¤®à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ार विजेता हैं। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ सà¥à¤®à¤¾à¤°à¤• टà¥à¤°à¤¸à¥à¤Ÿ (आईसीटी) 1988 से हर साल à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ आगमन दिवस कारà¥à¤¯à¤•à¥à¤°à¤® का आयोजन करता रहा है। आईसीटी की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ डॉ. पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ ने ही की थी। इस अवसर पर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ विशेष शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾à¤‚जलि देते हà¥à¤ याद किया गया।
वकà¥à¤¤à¤¾à¤“ं ने गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति à¤à¤µà¤‚ इतिहास के संरकà¥à¤·à¤£ के पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ के लिठपà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ उदà¥à¤¯à¥‹à¤—पति और परोपकारी डॉ पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ की à¤à¥‚रि à¤à¥‚रि पà¥à¤°à¤¶à¤‚सा की। समारोह में उनके परिवारीजन à¤à¥€ उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने ही पà¥à¤°à¤¶à¤¸à¥à¤¤à¤¿ पतà¥à¤° और समà¥à¤®à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया।
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¸à¥€ परिषद (आईडीसी) के अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤· अशोक रामसरन का जनà¥à¤® गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ में हà¥à¤†, हालांकि फिलहाल वह अमेरिका में रहते हैं। रामसरन के पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ के बाद à¤à¤¾à¤°à¤¤ सरकार ने 11 जनवरी 2011 को कोलकाता में कोलकाता मेमोरियल सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया था। यह मेमोरियल गिरमिटिया मजदूरों के à¤à¤¾à¤°à¤¤ छोड़कर गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ जाने की याद में बनाया गया है। इस मेमोरियल का शिलालेख à¤à¥€ रामसरन ने ही लिखा था।
गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ के आगमन की 175वीं वरà¥à¤·à¤—ांठपर 2013 में रामसरन ने à¤à¤¾à¤°à¤¤ सरकार और आईसीटी के डॉ पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ के साथ मिलकर हाईबरी में कोलकाता मेमोरियल की पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤•ृति तैयार करवाई थी। इसी जगह पर à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ का पहला जहाज उतरा था। इसके अलावा जॉरà¥à¤œ टाउन के मॉनूमेंट गारà¥à¤¡à¥‡à¤¨ में à¤à¥€ मेमोरियल बनाया गया था।
आईसीटी के अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤· हेमराज किसून ने रामसरन को पटà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ा à¤à¥‡à¤‚ट की जिस पर हाईबरी और कोलकाता में अशोक रामसरन दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखे गठशिलालेख का जिकà¥à¤° करते हà¥à¤ धनà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¦ दिया गया था।
समारोह में गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ के संसà¥à¤•ृति मंतà¥à¤°à¥€ चारà¥à¤²à¥à¤¸ रामसन और à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ उचà¥à¤šà¤¾à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤ डॉ. अमित तेलंग à¤à¥€ शामिल हà¥à¤à¥¤ दोनों ने à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति और गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ के विकास पर इसके सकारातà¥à¤®à¤• पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ की सराहना की। उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ अतिथियों में अमेरिकी मिशन के उप पà¥à¤°à¤®à¥à¤– à¤à¤¡à¥à¤°à¤¿à¤à¤¨ गैलानेक और कई अनà¥à¤¯ अधिकारी व सामà¥à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤• नेता à¤à¥€ शामिल थे।
बता दें कि à¤à¤¸à¤à¤¸ वà¥à¤¹à¤¿à¤Ÿà¤¬à¥€ जहाज 13 जनवरी 1838 को à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ गिरमिटिया मजदूरों को लेकर कलकतà¥à¤¤à¤¾ से रवाना हà¥à¤† था। इस जहाज पर 249 गिरमिटिया मजदूत थे, जिनमें 233 पà¥à¤°à¥à¤·, 5 महिलाà¤à¤‚ और 6 बचà¥à¤šà¥‡ थे। 112 दिनों की यातà¥à¤°à¤¾ करके ये लोग 5 मई 1838 को गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ पहà¥à¤‚चे थे। इसके बाद à¤à¤¸à¤à¤¸ हेसà¥à¤ªà¤°à¤¸ जहाज 29 जनवरी 1838 को कलकतà¥à¤¤à¤¾ से चला और 5 मई 1838 की रात को गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ पहà¥à¤‚चा। इसमें 165 यातà¥à¤°à¥€ सवार थे, जिनमें से 13 की गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ पहà¥à¤‚चने से पहले ही मौत हो गई थी।
इसके बाद अगले अगले 80 वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ तक लगà¤à¤— 2,39,000 à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ गिरमिटिया मजदूर गà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾ पहà¥à¤‚चे। बड़ी संखà¥à¤¯à¤¾ में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ को तà¥à¤°à¤¿à¤¨à¤¿à¤¦à¤¾à¤¦, सूरीनाम, जमैका और अनà¥à¤¯ बà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ उपनिवेशों में à¤à¥€ ले जाया गया। इनमें से अधिकांश शà¥à¤°à¤®à¤¿à¤• कà¤à¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ वापस नहीं लौटे और वहीं पर बस गà¤à¥¤
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