छह मारà¥à¤š, गेबà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤² गारà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤¾ मारà¥à¤•ेज का जनà¥à¤®à¤¦à¤¿à¤¨ है। इस नोबेल पà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ार विजेता लेखक को मैंने पहली बार कॉलेज के दिनों में जाना। हà¥à¤† यूं कि मेरी à¤à¤• बहà¥à¤¤ अचà¥à¤›à¥€ दोसà¥à¤¤ थी, उनका और मारà¥à¤•ेज का बरà¥à¤¥à¤¡à¥‡ à¤à¤• ही दिन पड़ता है। वह इसे लेकर बड़ा दिखावा करती थी, सबको बताती फिरती थी। आधे से जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ दोसà¥à¤¤à¥‹à¤‚ को उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने इस सà¥à¤ªà¥‡à¤¨à¤¿à¤¶ लेखक के बारे में बताया होगा। कमाल की बात ये है कि उस दोसà¥à¤¤ ने तो फà¥à¤°à¥‡à¤‚च में डिपà¥à¤²à¥‹à¤®à¤¾ किया था, पर न जाने कहां से उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ उस वकà¥à¤¤ सà¥à¤ªà¥ˆà¤¨à¤¿à¤¶ मारà¥à¤•ेज के बारे में पता था।
मैं बिहार के सिवान जिले के बसंतपà¥à¤° बà¥à¤²à¥‰à¤• से पà¥à¤£à¥‡ पढ़ने गई थी। मैंने तो तो सिरà¥à¤« पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द, रेणà¥, हजारी पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ दà¥à¤µà¤¿à¤µà¥‡à¤¦à¥€, सà¥à¤à¤¦à¥à¤°à¤¾ कà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ चौहान, महादेवी वरà¥à¤®à¤¾, अमृता पà¥à¤°à¥€à¤¤à¤®…इनके कà¥à¤› किताबें-कहानियां ही पढ़ी थीं। अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¥€ में à¤à¥€ बस रसà¥à¤•िन बॉनà¥à¤¡ की कà¥à¤› कहानियां पढ़ी थीं। उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸? कोई नहीं पढ़ा था। à¤à¤¸à¥‡ में मारà¥à¤•ेज पढ़ते वकà¥à¤¤ मैं ये सोचकर दंग रह गई कि à¤à¤¾à¤°à¤¤ के अलावा à¤à¥€ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ में à¤à¤¸à¥€ जगहें हैं जहां à¤à¥‚त-पà¥à¤°à¥‡à¤¤à¥‹à¤‚ में यकीन करते हैं।
खैर, धीरज कम था और पातà¥à¤°à¥‹à¤‚ के नाम याद रखने में दिकà¥à¤•त होती थी, इसलिठकिताब अधूरी रह गई और दोसà¥à¤¤ को वापस कर दी। अमेरिका आने के बाद जब लाइबà¥à¤°à¥‡à¤°à¥€ में कà¥à¤› दिनों काम किया तब इस किताब को देखकर मन में फिर से पढ़ने की इचà¥à¤›à¤¾ जगी। किताब घर ले आई। लेकिन इस बार à¤à¥€ इतनी बोà¤à¤¿à¤² -पेचीदा और पातà¥à¤°à¥‹à¤‚ के नाम की मिलावट ने इसे पूरा नहीं होने दिया और किताब लौटने का दिन आ गया।
à¤à¤• दिन पà¥à¤°à¤¿à¤‚सà¥à¤Ÿà¤¨ यूनिवरà¥à¤¸à¤¿à¤Ÿà¥€ गई, तो वहां इस किताब पर चरà¥à¤šà¤¾ का बैनर लगा था नोटिस बोरà¥à¤¡ पर। फिर मन में उसी किताब का खà¥à¤¯à¤¾à¤² आया। इस बार सोचा कि किताब ही खरीद लूं और आराम से, बिना किसी समय-सीमा के, पढ़ लूं।
पहली बार 'थà¥à¤°à¤¿à¤«à¥à¤Ÿ बà¥à¤•à¥à¤¸' से किताब ली। ये सेकेंड हैंड किताबों की ऑनलाइन दà¥à¤•ान है। लाइबà¥à¤°à¥‡à¤°à¥€ में काम करने वाली à¤à¤• लड़की ने इसके बारे में बताया था। अचà¥à¤›à¤¾ हà¥à¤† कि जहां और जगहों पर किताबों के सà¥à¤Ÿà¥‹à¤° या अमेजन पर ये किताब 15-25 डॉलर की मिल रही थी, वहीं थà¥à¤°à¤¿à¤«à¥à¤Ÿ बà¥à¤•à¥à¤¸ पे महज 4.99 डॉलर में मिल गई।उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¤¾ à¤à¤¡à¤¿à¤¶à¤¨ à¤à¥‡à¤œà¤¾ था। किताब से à¤à¤• अजीब सी खà¥à¤¶à¤¬à¥‚ आ रही थी, पनà¥à¤¨à¥‡ पीले-पीले पड़ गठथे। कवर का कोना à¤à¤¸à¤¾ लग रहा था जैसे सात समà¥à¤‚दर पार करके आया हो। मà¥à¤à¥‡ लगा जैसे ये जादू की दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की कोई किताब है, सौ साल पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ तो नहीं, पर रिशà¥à¤¤à¥‹à¤‚ की उलà¤à¤¨ की वजह से जरा खसà¥à¤¤à¤¾à¤¹à¤¾à¤² जरूर लग रही थी। देखकर ही मन उदास हो रहा था।
कई बार à¤à¤¸à¤¾ होता है ना, कà¥à¤› चीजें बहà¥à¤¤ परखती हैं। इसी तरह, शà¥à¤°à¥‚ में थोड़ी दिकà¥à¤•त हà¥à¤ˆ, पर फिर किताब पढ़ने में मजा आने लगा। आखिरकार, 383 पनà¥à¤¨à¥‹à¤‚ की ये जादà¥à¤ˆ किताब पूरी हो गई। 'वन हंडà¥à¤°à¥‡à¤¡ इयरà¥à¤¸ ऑफ सॉलिटà¥à¤¯à¥‚ड' नाम की ये किताब आपका सबà¥à¤° परखती है। लेकिन à¤à¤• बार अगर आप पढ़ना शà¥à¤°à¥‚ कर दें, तो इसके जादू में खो जाते हैं।
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