सूरà¥à¤¯ की उपासना के चार- दिवसीय लोकमहापरà¥à¤µ छठकी शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ हो चà¥à¤•ी है। पूरà¥à¤µà¤¾à¤‚चल की छठपरंपरा अब à¤à¤¾à¤°à¤¤ के लगà¤à¤— हर कोने के साथ-साथ विदेशों में à¤à¥€ अपनी छाप छोड़ रही है। पà¥à¤°à¤•ृति की पूजा का यह वà¥à¤°à¤¤ ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब, सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€-पà¥à¤°à¥à¤· के à¤à¥‡à¤¦ से परे है।
हमारे धरà¥à¤® और शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में असंखà¥à¤¯ देवी-देवताओं का वरà¥à¤£à¤¨ है। कई क़िसà¥à¤¸à¥‡ हमने सà¥à¤¨à¥‡ हैं लेकिन हमने कà¤à¥€ उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ नहीं देखा। देव-देवियों के रूप में सूरà¥à¤¯, चंदà¥à¤°, नदियां ही सदा हमारी आंखों के सामने रहे हैं। हमें कà¤à¥€ इनके असà¥à¤¤à¤¿à¤µ को सà¥à¤µà¥€à¤•ारने में किसी तरà¥à¤• या पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ की ज़रूरत महसूस नहीं होती है। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· देव-देवियों की पूजा का नाम छठहै।
छठकी पूजा इतनी सरल है कि अगर आपके पास कà¥à¤› à¤à¥€ नहीं है, तब à¤à¥€ à¤à¤• नारियल मातà¥à¤° से आप सूरà¥à¤¯ को अरà¥à¤˜à¥à¤¯ दे सकते हैं। ना मंतà¥à¤° की ज़रूरत, ना ही पà¥à¤°à¥‹à¤¹à¤¿à¤¤ की। वà¥à¤°à¤¤à¥€ लोकगीतों के ज़रिठसूरà¥à¤¯ और नदियों की गोहार लगाते हैं। वैसे à¤à¥€ पà¥à¤°à¤•ृति को हम दे à¤à¥€ कà¥à¤¯à¤¾ सकते हैं, उनका आà¤à¤¾à¤° मानने के सिवा। हम कामना करते हैं कि हे सूरà¥à¤¯, आप हमारी संतानों की रकà¥à¤·à¤¾ करें, हमें जीवन दें। हमारी धरती हरी-à¤à¤°à¥€ रहे।
वैसे तो हर वà¥à¤°à¤¤ और तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ से हम à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯à¥‹à¤‚ की यादें और विशà¥à¤µà¤¾à¤¸ जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ होता है, लेकिन छठपूरà¥à¤µà¤¾à¤‚चल के लिठà¤à¤• इमोशन की तरह है। हम चाहे घर से कितनी à¤à¥€ दूर रहते हों, छठपर घर की बहà¥à¤¤ याद आती है। आंखें नम हो जाती हैं और हम ढूंढते रहते हैं कि परदेश में à¤à¥€ कोई छठवà¥à¤°à¤¤à¥€ मिल जाठतो उसके चरण छूकर आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ लिया जा सके।
इसी की खोज में मैं अमेरिका में रहते हà¥à¤ कई अदà¥à¤à¥à¤¤ लोगों से मिली। पहली बार तीन घंटे की डà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤µ करके वरà¥à¤œà¥€à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के पॉटमेक रिवर के किनारे पहà¥à¤‚ची। वहां वà¥à¤°à¤¤à¥€ अनीता जी छठकर रही थीं। मेरी जानकारी के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°, अमेरिका में लेक/समà¥à¤‚दर किनारे छठपूजा परमà¥à¤ªà¤°à¤¾ की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ अनीता ने ही की है। अब तो कई लोग अलग-अलग शहरों में घरों से निकलकर समà¥à¤¦à¥à¤°/लेक पर छठपूजा करने पहà¥à¤‚चने लगे हैं।
लोकपरà¥à¤µ छठका जिकà¥à¤° हो और हमारी लोकगायिका शारदा सिनà¥à¤¹à¤¾ को याद ना किया जाà¤, यह लगà¤à¤— असंà¤à¤µ है। शारदा जी की आवाज़ और छठके गीत मानो à¤à¤•दूसरे के पूरक हैं। बिना इनके छठपूजा सूनी-सूनी सी लगती है।
यह संयोग है या छठी मईया का शारदा जी से पà¥à¤°à¥‡à¤®, कि छठपरà¥à¤µ की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ के पहले ही दिन वह पारà¥à¤¥à¤¿à¤µ शरीर को छोड़कर बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड में लीन हो गईं। मेरी आंखें यह सोचकर à¤à¥€à¤— रही हैं कि जिस घाट पर छठी माई के आने की तैयारी हो रही होगी, वहीं किसी घाट पर शारदा जी की विदाई की।
कितना मारà¥à¤®à¤¿à¤• दृशà¥à¤¯ होगा। à¤à¤• घाट उनके गीतों से गूंज रहा होगा, वहीं दूसरा चिता की लौ से नारंगी हो रहा होगा। सूरज ढल रहा होगा। वà¥à¤°à¤¤à¥€ जल में खड़ी होकर सूरज देव को गोहरा रही होंगी कि हे देव, सब पर अपनी कृपा बनाठरखें।
अगली सà¥à¤¬à¤¹ उगते सूरज के साथ शारदा जी की आवाज़ में उसी घाट पर संगीत बज रहा होगा- उगी हे सà¥à¤°à¥à¤œ देव à¤à¥‹à¤° à¤à¤¿à¤¨à¤¸à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¤¾…
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