पूरब के लोगों के लिठहोली अपने साथ रंग - पà¥à¤°à¥‡à¤® - उतà¥à¤¸à¤µ और लोकगीतों की बौछार लेकर आती है। वहीं खेत-खलिहान वालों के लिठफसलों का तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥¤ मौसम à¤à¤¸à¤¾ होता है कि हर तरफ बौर छाया रहता है। à¤à¤¸à¥‡ में कैसे नव विवाहित जोड़े पर फागà¥à¤¨ का असर ना हो। कैसे लोककवि गीत ना लिखते? कैसे लोकगायक यह दरà¥à¤¦, नोक-à¤à¥‹à¤‚क, पà¥à¤°à¥‡à¤® सà¥à¤°à¥‹à¤‚ में ना बांटते? कैसे घर की विवाहित बेटी अपने पिया का इंतज़ार कर रही है की गवना नही कराया लेकिन होली में तो मिलने आ जाते पिया।
à¤à¤¸à¥‡ में लोकगीतों के माधà¥à¤¯à¤® से फगà¥à¤¨à¤¾à¤¹à¤Ÿ के क़िसà¥à¤¸à¥‡
फागà¥à¤¨ के साथ खेतों में सरसों की पिटाई हो रही है। चार दिन की बहूरिया अपने मेहंदी लगे हाथों से सरसों पीट रही है। à¤à¤¸à¥‡ में उसके दूलà¥à¤¹à¥‡ की नज़र उसपर पड़ती है। अपनी दà¥à¤²à¥à¤¹à¤¨ की हालत देख वह गà¥à¤¨à¤—à¥à¤¨à¤¾ उठता है,
“पानवा नियर गोरी आतर पातर, फूलवा नियर सà¥à¤•ूमार होऽऽऽ ला..... ला ....गोरी, हो आतर - पातर”
इतना सà¥à¤¨à¤¤à¥‡ ही दà¥à¤²à¥à¤¹à¤¨ का मà¥à¤‚ह बिना गà¥à¤²à¤¾à¤², गà¥à¤²à¤¾à¤¬à¥€ हो उठता है। अंचरा से मà¥à¤‚ह ढांक कर कनखी से अपनी ननद की तरफ़ देखती है कि कहीं वह तो नही सà¥à¤¨ रही यह सब।
ननद रानी इन सब को देख कर अनदेखा करती हà¥à¤ˆ सरसों को मसल रहीं है, à¤à¤¸à¥‡ जैसे सारे अरमान मसल रही हो। सोच रही है कि à¤à¤• मेरा मरद है
जिसे मेरी चिंता ही नही। à¤à¤¸à¥‡ में नई- नवेली à¤à¤¾à¤à¥€ पूछती है, “बबूनी काहे मà¥à¤‚ह सूखईले बानी? सब ठीक बा नू?” ननद रानी à¤à¤°à¥‡ आà¤à¤–, रà¥à¤‚धे गले से कहती है- à¤à¥Œà¤œà¥€ तà¥à¤®à¤¸à¥‡ कà¥à¤¯à¤¾ छिपाना,
“पिया छोड़ी गईले परदेसवा रे
आइल फागà¥à¤¨ के महिनवा रे सखियाअ”
à¤à¥Œà¤œà¥€, ननद को समà¤à¤¾à¤¤à¥€ है, चिंता मत करीं। à¤à¥‹à¤²à¥‡ बाबा पर बीसबास रखी। पाहà¥à¤¨ होली में ज़रूर आà¤à¤®à¥¤ à¤à¥Œà¤œà¥€ की बात से ननदो को बल मिलता है। और दोनों ननद- à¤à¥Œà¤œà¤¾à¤ˆ सरसों को पसार घर के कामों में लग जातीं है।
शाम को à¤à¥‹à¤œà¤¨ की तैयारी में लगी à¤à¥Œà¤œà¥€ तरकारी के लिठहरदी पीसने बैठी तो हरदी à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤¨ की जलà¥à¤¦à¥€ कà¥à¤šà¤¾à¤ ना। पास ही बरà¥à¤¤à¤¨ धो रही अपनी ननद से पूछती है,
“कहवा के हाऊवे सील-सीलवटीया कहवा के हरदी पà¥à¤°à¤¾à¤¨ हो”
ननद रानी हंस कर जबाब देती है, “राउरा नईहरे के हवे सील - सिलवातिया, ससà¥à¤°à¤¾ के हरदी पà¥à¤°à¤¾à¤¨ हो, गोरिया आंगना में पिसेलू हरदीया…”
वहीं दिन à¤à¤° की सरसों पिटाई और पूरवा हवा के ज़ोर से बेचारी सà¥à¤•à¥à¤®à¤¾à¤° कनिया, सरà¥à¤¦à¥€-गरम से फूल रही है। नाक à¤à¤¾à¤¡à¤¼-à¤à¤¾à¤¡à¤¼ के बिना रंग के लाल हà¥à¤† जा रहा है।
à¤à¤¸à¥‡ में उसके दूलà¥à¤¹à¤¾ को देखा नही जाता। कहता है कि “सà¥à¤¨à¤… ना नकबेसर खोल के रख द, ना त नाक छिला जाई।”
नई कनिया को à¤à¥€ बात सही लगती है। ऊ à¤à¥€ ई नकबेसर से परेशान है। निकाल कर रख देती है अंगना में जहां महावीर जी का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ है। अपने दूलà¥à¤¹à¤¾ से कहती है, “तनी देखत रहिà¤à¤—ा नकबेसरवा हम आà¤à¤—नवा लीप ली तबतक, होली जो है।”
इधर दूलà¥à¤¹à¤¾ राजा चिवड़ा- दही का पान कर खटिया पर पड़े, हमà¥à¤® तो कह देते है पर इसी बीच उनकी आंख लग जाती है ।
सà¥à¤¬à¤¹ - सेबर के बेरा में कउवा सब का मौज होता है। à¤à¤¸à¥‡ में à¤à¤• कोवा à¤à¥‹à¤œà¤¨ की तलाश में अंगना में मंडरा रहा था। नकबेसर को ही अपना à¤à¥‹à¤— समठकर ले à¤à¤¾à¤—ता है।
कनिया, कौवा को नकबेसर ले जाते देखती है तो छाती फाड़ कर रोने लगती है,
“नकबेसर कागा ले à¤à¤¾à¤—ा,मोरा साइयाठअनाड़ी ना जागा”
साइंया राम जब अपनी दà¥à¤²à¥à¤¹à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का विलाप सà¥à¤¨à¤¤à¥‡ है हड़बड़ा कर उठते हैं। कहते हैं, मत रोव हमार करेजा। हमारा से ग़लती हो गईल। हम तोहरा के लाली चà¥à¤¨à¤°à¥€ ले आà¤à¤®à¥¤
कनिया पूछती है कहवा के लाली चà¥à¤¨à¤°à¥€ ? साइयां कहते हैं,
“हाजीपà¥à¤° के लाली हो चà¥à¤¨à¤°à¤¿à¤¯à¤¾,पटना के रंगरेज सजनी लाली चà¥à¤¨à¤°à¥€…हो लाली चà¥à¤¨à¤°à¥€à¥¤”
इधर नव दंपति होली के साथ पà¥à¤°à¥‡à¤® के रंग में डूबा हà¥à¤† है की उधर à¤à¥‹à¤²à¥‡ बाबा और रेल बाबा की किरपा से ननदो के पाहà¥à¤¨ अपने ससà¥à¤°à¤¾ में रंग खेलने पहली बार आ रहें है। सूट -बूट के साथ अटैची लिठजब गाà¤à¤µ में पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करतें है तो देखते है कि-
“फाग खेलत सारा गाà¤à¤µ रे रसिया फागà¥à¤¨ आया ...”
गांव का लाईका सब पाहà¥à¤¨ को रासà¥à¤¤à¥‡ में पकड़ कर रंगने लगता है । इधर à¤à¤• छोट लईका दौड़ कर घर पहà¥à¤‚चता है बताने को की जीजा जी आ रहें है। ननद रानी à¤à¥‹à¤²à¥‡ बाबा को बार -बार गोड़ लाग रहीं है, बार -बार खिड़की- दà¥à¤†à¤° तक जा रही है कि कहां रह गठपिया मोरे? अधीर हो पड़ोस के à¤à¤• लईका को à¤à¥‡à¤œà¤¤à¥€ है पता लगाने को। वह बालक आकर कहता है- दीदिया, “यमà¥à¤¨à¤¾ तट शà¥à¤¯à¤¾à¤® खेलत होरी यमà¥à¤¨à¤¾ तट ...”
अब ननद रानी से सबर नही होता है। अबीर -रंग की थाल लिठवह निकल पड़ती है, अपने शà¥à¤¯à¤¾à¤® राम को रंगने।
“उत से निकली नवल जानकी लेकर हाथ अबीर, होरी खेलत रघà¥à¤¬à¥€à¤°…”
होली के रंगों से सराबोर घर की नई कनिया, अपने दूलà¥à¤¹à¥‡ को पà¥à¤°à¥‡à¤® पूरà¥à¤£ ताना देती है कि,
“à¤à¤¸à¥€ होरी ना खेलो कनà¥à¤¹à¤¾à¤ˆ रे à¤à¤¸à¥€ होरी
तन मन रंग सब शà¥à¤¯à¤¾à¤® तà¥à¤® जानत, जाओ - जाओ बनवारी रे ...”
इसी बीच ननद रानी à¤à¥‚त बनी अपनी पति के साथ घर पहà¥à¤à¤šà¤¤à¥€ है।à¤à¤¾à¤à¥€ उनका सà¥à¤µà¤¾à¤—त रंगो से करती है। गांव के पाहून को रंगने सारा गांव उमड़ पड़ता है। महिलाà¤à¤ रंगों से à¤à¤° देती हैं। वहीं पà¥à¤°à¥à¤·à¥‹à¤‚ की टोली, ढोल-à¤à¤¾à¤² के साथ निकल पड़ता है गाते हà¥à¤,
“खेले मसान में होरी दिगमà¥à¤¬à¤°
खेले मसान में होरी…”
और इसी के साथ आप सबको होली की रंगीन शà¥à¤à¤•ामनाà¤à¤‚ !!!
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