कà¥à¤¯à¤¾ आप जानते हैं कि 16वीं सदी तक दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के कई हिसà¥à¤¸à¥‹à¤‚ में वसंत विषà¥à¤µ (Vernal Equinox) को नठसाल की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ के तौर पर मनाया जाता था। हालांकि, गà¥à¤²à¤¾à¤®à¥€ के दौर में à¤à¤¾à¤°à¤¤ में गà¥à¤°à¥‡à¤—ोरियन कैलेंडर अपनाने के बाद नया साल 1 जनवरी को मनाया जाने लगा। लेकिन वसंत ऋतॠहमेशा से ही नई शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ और नठजीवन का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• रहा है और आज à¤à¥€ है।
सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ का जादू: à¤à¤• à¤à¤¾à¤°à¤¤ के धागों से बà¥à¤¨à¥€ कहानी
à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ को जोड़ने वाले अदृशà¥à¤¯ धागों का पता लगाना à¤à¤• अनोखा जादू है। यह खोज टà¥à¤•ड़ों में सामने आती है - तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के बीच à¤à¤• अनपेकà¥à¤·à¤¿à¤¤ जà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤µ, पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ परंपराओं के बारे में अचानक अनà¥à¤à¥‚ति, à¤à¤• 'आहा' का पल जब कोई अलग-थलग दिखने वाला अनà¥à¤·à¥à¤ ान देश के किसी दूसरे कोने में पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¿à¤‚बित होता है। ये पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ के पल जà¥à¤—नà¥à¤“ं की तरह हैं जो à¤à¤• विशाल और जटिल जाल को रोशन करते हैं - जिसने हजारों वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ से à¤à¤¾à¤°à¤¤ को à¤à¤•जà¥à¤Ÿ रखा है।
धारà¥à¤®à¤¿à¤• सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾: à¤à¤• जीवंत ताना-बाना
à¤à¤¾à¤°à¤¤ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की अकेली à¤à¤¸à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ है जो आज à¤à¥€ पूरी तरह जिंदा है और फल-फूल रही है। दूसरी कई बड़ी सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾à¤à¤‚ तो अब बस संगà¥à¤°à¤¹à¤¾à¤²à¤¯à¥‹à¤‚ की चीज बनकर रह गई हैं। लेकिन à¤à¤¾à¤°à¤¤ आज à¤à¥€ जोश और उमंग से à¤à¤°à¥‡ रीति-रिवाजों का जीता-जागता सबूत है। इसकी परंपराà¤à¤‚, इसके रंग और इसकी धà¥à¤¨à¥‡à¤‚ बाहरी हमलों, गà¥à¤²à¤¾à¤®à¥€ और नठजमाने के दौर से गà¥à¤œà¤°à¥€à¤‚, लेकिन अपना वजूद बचाठरखा।
इस जिंदादिली का सबसे शानदार सबूत à¤à¤¾à¤°à¤¤ के तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के कैलेंडर में देखने को मिलता है। देश में à¤à¤• तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° खतà¥à¤® होता नहीं कि दूसरा आ जाता है। इससे खà¥à¤¶à¥€ और जशà¥à¤¨ का माहौल हमेशा बना रहता है। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ में वो सबसे मजबूत धागे मिलते हैं जो इस देश के लोगों को आपस में जोड़ते हैं, चाहे वो दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ में कहीं à¤à¥€ हों।
लेकिन इन जशà¥à¤¨ और खà¥à¤¶à¥€ के पीछे à¤à¤• अनोखा राज छिपा है, जिसे बाकी दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ à¤à¥‚ल चà¥à¤•ी है। ये राज है - शकà¥à¤¤à¤¿ यानी नारी शकà¥à¤¤à¤¿ का महतà¥à¤µà¥¤ देवी का केंदà¥à¤°à¥€à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥¤ à¤à¤¾à¤°à¤¤ की संसà¥à¤•ृति और अधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤® में महिलाओं की अहमियत। तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ में सजी-धजी हर महिला किसी रानी, राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ या देवी का रूप लगती है। वो गानों, नाच और पवितà¥à¤° रसà¥à¤®à¥‹à¤‚ के जरिठइस सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ को आगे बढ़ाती है। à¤à¤• पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से जोड़ती है।
विशाखा: वसंत का मिलन और समय का मेल
à¤à¤¾à¤°à¤¤ में नठसाल को अलग-अलग राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, पर सबका आधार à¤à¤• ही है। वह समय जब दिन और रात बराबर होते हैं। संसà¥à¤•ृत में इसे 'विशाखा' कहते हैं। इसका मतलब है 'दो बराबर हिसà¥à¤¸à¥‡' - दिन और रात का पूरा बराबर होना। इसी शबà¥à¤¦ से पंजाब में बैसाखी, केरल में विशà¥, असम में बिहू, और नेपाल में बिशॠजैसे तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के नाम बने हैं।
मीमà¥à¤¸ और सोशल मीडिया पर à¤à¤²à¥‡ ही इन नामों के अंतर पर हंसी-मजाक होता है, पर असल में विशाखा शबà¥à¤¦ से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ ये सà¤à¥€ नाम à¤à¤• ही बात कहते हैं - यह वह खास समय है जब सब कà¥à¤› नया होता है। कशà¥à¤®à¥€à¤° में नवरेह, बंगाल और ओडिशा में पोहेला बोइशाख जिसे 'शà¥à¤à¥‹ नोबोबोरà¥à¤·à¥‹' कहकर बधाई दी जाती है। सिंध में चेती चांद (चैतà¥à¤° महीने का चांद) या तमिल में पà¥à¤¥à¤¾à¤‚डू - ये सà¤à¥€ चैतà¥à¤° महीने (तमिल में चितà¥à¤¥à¤¿à¤°à¥ˆ) में आते हैं और नठसाल की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ करते हैं।
उगादि (à¤à¤• नया समय), गà¥à¤¡à¤¼à¥€ पड़वा (चांद के पकà¥à¤· का पहला दिन), या मणिपà¥à¤° का चेईराओबा - नाम à¤à¤²à¥‡ ही अलग हों, पर ये सà¤à¥€ à¤à¤• साथ मिलकर फसलों की कटाई, नठफूलों के खिलने, नई शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ और बसंत के आने का जशà¥à¤¨ मनाते हैं।
मिटà¥à¤Ÿà¥€ के घड़े में बसी सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾: कà¥à¤‚à¤, करग, कलशम
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ परंपराओं में सबसे दिलचसà¥à¤ª और पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ों में से à¤à¤• है साधारण मिटà¥à¤Ÿà¥€ का घड़ा। इसे कलश, करग या कà¥à¤‚ठजैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। लेकिन यह अलग-अलग तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ और कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में à¤à¤• जैसी पवितà¥à¤° à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ लिठहोता है। यह सिरà¥à¤« à¤à¤• वसà¥à¤¤à¥ नहीं, बलà¥à¤•ि मौके और जगह के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° बदलकर आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• और धारà¥à¤®à¤¿à¤• महतà¥à¤µ का रूप ले लेता है। दकà¥à¤·à¤¿à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में, यह वरलकà¥à¤·à¥à¤®à¥€ वà¥à¤°à¤¤ के दौरान आम के पतà¥à¤¤à¥‡ और नारियल से सजा 'कलशम' बन जाता है। राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में, गणगौर के दौरान महिलाà¤à¤‚ इसे जà¥à¤²à¥‚सों में ले जाती हैं। जहां गौरी के शिव के साथ मिलन का जशà¥à¤¨ मनाया जाता है। और सबसे बड़े उतà¥à¤¸à¤µ महाकà¥à¤‚ठमेले में, यह घड़ा (कà¥à¤‚à¤) अमृत रखता है। इस दौरान लाखों-करोड़ों लोग शà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ और मोकà¥à¤· की खोज में इकटà¥à¤ ा होते हैं।
सबसे दिलचसà¥à¤ª à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤ˆ और सांसà¥à¤•ृतिक जà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤µ जो मà¥à¤à¥‡ मिला, वह था करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤• के करग तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° और उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ के करवा चौथ के बीच। करग तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°, जिसे तमिल à¤à¤¾à¤·à¥€ वहà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤•à¥à¤²à¤¾ कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ (थिगलास) मनाते हैं। यह दà¥à¤°à¥Œà¤ªà¤¦à¥€ का समà¥à¤®à¤¾à¤¨ à¤à¤• घड़े पर रखे जटिल फूलों के पिरामिड के रूप में करता है। यह रंगीन तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°, जिसमें नृतà¥à¤¯, à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ और नाटक का शानदार मिशà¥à¤°à¤£ है। यह उतà¥à¤¸à¤µ हर साल पांच लाख से जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ à¤à¤•à¥à¤¤à¥‹à¤‚ को आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ करता है, जो दà¥à¤°à¥Œà¤ªà¤¦à¥€ अमà¥à¤®à¤¾ को अपनी पूरà¥à¤µà¤œ और रकà¥à¤·à¤• के रूप में मानते हैं।
वीरकà¥à¤®à¤¾à¤°: दà¥à¤°à¥Œà¤ªà¤¦à¥€ के योदà¥à¤§à¤¾ à¤à¤•à¥à¤¤à¥‹à¤‚ की जीती-जागती परंपरा
करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤• में दà¥à¤°à¥Œà¤ªà¤¦à¥€ के वीर à¤à¤•à¥à¤¤ 'वीरकà¥à¤®à¤¾à¤°' महाà¤à¤¾à¤°à¤¤ की परंपरा को आज à¤à¥€ जिंदा रखे हà¥à¤ हैं। हर साल मारà¥à¤š में, जब à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ अपने सिर पर पवितà¥à¤° घड़े को संà¤à¤¾à¤²à¤•र चलता है, तब पूरा समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ सदियों पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ कहानी को फिर से जीता है। दà¥à¤°à¥Œà¤ªà¤¦à¥€ से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ होने के अलावा, 'करगा' शबà¥à¤¦ 'करक' जैसा ही है - जैसे करक चतà¥à¤°à¥à¤¥à¥€, जिसे हम उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ में करवा चौथ के नाम से जानते हैं।
बॉलीवà¥à¤¡ फिलà¥à¤®à¥‹à¤‚ में करवा चौथ को à¤à¤¸à¤¾ दिखाया जाता है जैसे पतà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ सिरà¥à¤« अपने पति की लंबी उमà¥à¤° के लिठवà¥à¤°à¤¤ रखती हैं। लेकिन असल में यह तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° नारीतà¥à¤µ का जशà¥à¤¨ है। घड़ा, पानी, चांद और सोलह शà¥à¤°à¥ƒà¤‚गार में सजी औरत - हर चीज नारी शकà¥à¤¤à¤¿ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। अगर à¤à¤¾à¤°à¤¤ में परंपरा से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ कोई महिला दिवस होता, तो वह शायद करक चतà¥à¤°à¥à¤¥à¥€ ही होता।
इतनी अलग-अलग परंपराओं में घड़े का महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ होना कोई संयोग नहीं है। यह जीवन का गहरा पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ में नवरातà¥à¤°à¤¿ के दौरान होने वाला गरबा नृतà¥à¤¯ में घड़ा मां के गरà¥à¤ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है, जिसमें देवी की जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ रहती है। पूरे à¤à¤¾à¤°à¤¤ में, घड़ा à¤à¤• पवितà¥à¤° चिनà¥à¤¹ है। कà¤à¥€ पूजा का बरà¥à¤¤à¤¨, कà¤à¥€ पà¥à¤°à¤œà¤¨à¤¨ शकà¥à¤¤à¤¿ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•, तो कà¤à¥€ देवी के आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ का माधà¥à¤¯à¤®à¥¤ जब तक à¤à¤¾à¤°à¤¤ अपने तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚, रीति-रिवाजों और साधारण घड़े में à¤à¥€ दिवà¥à¤¯à¤¤à¤¾ देखने की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ को जिंदा रखेगा, तब तक नारी शकà¥à¤¤à¤¿ फलती-फूलती रहेगी। देवी अपना आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ देती रहेंगी। हमारी बेशकीमती विरासत अटूट बनी रहेगी।
शिव मंदिरों का पवितà¥à¤° à¤à¥‚गोल
अगर आपको à¤à¤¾à¤°à¤¤ की à¤à¥Œà¤—ोलिक à¤à¤•ता की पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ और गहरी समठका और पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ चाहिà¤, तो पà¥à¤°à¤®à¥à¤– शिव मंदिरों की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ को देखिà¤à¥¤ हिमालय में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ केदारनाथ से लेकर दकà¥à¤·à¤¿à¤£ के रामेशà¥à¤µà¤°à¤® तक, आठमंदिर 79 डिगà¥à¤°à¥€ देशांतर रेखा पर à¤à¤•दम सीधी लाइन में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ हैं। अलग-अलग हजार सालों में बने, अलग-अलग सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¤à¥à¤¯ शैलियों वाले और अलग-अलग राजवंशों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ बनवाठगठये मंदिर अपनी सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में अदà¥à¤à¥à¤¤ सटीकता रखते हैं। कà¥à¤¯à¤¾ यह à¤à¤• संयोग है? या फिर हमारे पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ के पास à¤à¤¸à¤¾ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ था जो समय से परे था।à¤à¤¸à¤¾ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ जो सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ और पवितà¥à¤°à¤¤à¤¾ को à¤à¤¸à¥‡ तरीकों से जोड़ता था जिसे हम अà¤à¥€ तक पूरी तरह समठनहीं पाठहैं?
निषà¥à¤•रà¥à¤·: विविधता में à¤à¤•ता, बंटवारा नहीं
हम à¤à¤¾à¤°à¤¤ की विविधता पर इतना जोर देते हैं कि अकà¥à¤¸à¤° इसकी अंदरूनी à¤à¤•ता का जशà¥à¤¨ मनाना à¤à¥‚ल जाते हैं। सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¤à¤¿à¤•, जो पूरे à¤à¤¶à¤¿à¤¯à¤¾ में पवितà¥à¤° पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। पवितà¥à¤° अगà¥à¤¨à¤¿ (हवन कà¥à¤‚ड) के डिजाइन जो पूरे देश में देखे जाते हैं। रीति-रिवाजों और मानà¥à¤¯à¤¤à¤¾à¤“ं में साà¤à¤¾ बातें - ये सब हमारी गहरी सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ की निरंतरता की कहानी बताते हैं। लेकिन जब हम à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤ˆ और कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯ राजनीति को इस साà¤à¤¾ इतिहास से ऊपर रखते हैं, तो हम उनà¥à¤¹à¥€à¤‚ जालों में फंसने का खतरा मोल लेते हैं जो कà¤à¥€ औपनिवेशिक शासकों ने हमारे लिठबिछाठथे। à¤à¤¾à¤°à¤¤ की ताकत हमेशा अपनी विविधताओं को à¤à¤• साथ रखने की कà¥à¤·à¤®à¤¤à¤¾ रही है। जैसे à¤à¤• बड़ी, जटिल कढ़ाई जिसमें हर धागा मायने रखता है।
तो, जैसे हम नठसाल चैतà¥à¤° नवरातà¥à¤°à¤¿ में पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करते हैं, आइठसिरà¥à¤« तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ का ही नहीं बलà¥à¤•ि सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ के जादू का à¤à¥€ जशà¥à¤¨ मनाà¤à¤‚। वे अदृशà¥à¤¯ लेकिन अविनाशी धागे जो à¤à¤¾à¤°à¤¤ को à¤à¤• बनाते हैं।
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