जैसे ही मणिपà¥à¤° के उतà¥à¤¤à¤°-पूरà¥à¤µà¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में सà¥à¤¬à¤¹ की पहली किरणें फैलती हैं, परिवार जलà¥à¤¦à¥€ उठजाते हैं। उनके घर पहले से ही मौसमी फूलों की मीठी खà¥à¤¶à¤¬à¥‚ और लकड़ी की आग पर पकते पारंपरिक वà¥à¤¯à¤‚जनों की मिटà¥à¤Ÿà¥€ जैसी सà¥à¤—ंध से महक रहे होते हैं। रंग-बिरंगे नठकपड़ों में बचà¥à¤šà¥‡ ताजगी से चमकते घरों में खà¥à¤¶à¥€ से दौड़ते हैं, जबकि बड़े पारंपरिक वà¥à¤¯à¤‚जन और पवितà¥à¤° चढ़ावे तैयार करते हैं।
मैतेई नववरà¥à¤· की पौराणिक जड़ें
यह साजिबॠचैराओबा है—मैतेई नववरà¥à¤·—जो मैतेई चंदà¥à¤° कैलेंडर के सजिबॠमहीने के पहले दिन पड़ता है, आमतौर पर मारà¥à¤š के अंत या अपà¥à¤°à¥ˆà¤² की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में। "चैराओबा" शबà¥à¤¦ "चैई" (छड़ी) और "लाओबा" (घोषणा) से मिलकर बना है, जो कà¤à¥€ गांवों में नठसाल की घोषणा के लिठघà¥à¤®à¤¾à¤ˆ जाने वाली घंटी-यà¥à¤•à¥à¤¤ छड़ी को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¤¾ था।
चैतबा की परंपरा और समय के साथ बदलाव
पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ समय में चैतबा नामक à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• रूप से आने वाले वरà¥à¤· की बà¥à¤°à¥€ शकà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को अपने ऊपर लेता था। यह पà¥à¤°à¤¥à¤¾ अब à¤à¤²à¥‡ ही समापà¥à¤¤ हो चà¥à¤•ी हो, लेकिन नकारातà¥à¤®à¤•ता को पीछे छोड़ने का à¤à¤¾à¤µ आज à¤à¥€ जीवित है।
18वीं सदी में जब मैतेई समाज ने वैषà¥à¤£à¤µ धरà¥à¤® को अपनाया, तब कैलेंडर बदल गया—अब कई लोग इसे अपà¥à¤°à¥ˆà¤² 13-14 को मनाते हैं। बावजूद इसके, परà¥à¤µ की आतà¥à¤®à¤¾ जस की तस बनी हà¥à¤ˆ है।
साफ-सफाई से शà¥à¤°à¥‚ होती है नयापन की यातà¥à¤°à¤¾
चैराओबा से पहले घरों में सफाई का जोर होता है—फरà¥à¤¶ बà¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡ जाते हैं, कोनों की धूल हटाई जाती है और दीवारों पर नई पà¥à¤¤à¤¾à¤ˆ तक की जाती है। मेरे बà¥à¤œà¥à¤°à¥à¤— अकà¥à¤¸à¤° कहते हैं, “साफ-सफाई सिरà¥à¤« सà¥à¤µà¤šà¥à¤›à¤¤à¤¾ नहीं, यह नई ऊरà¥à¤œà¤¾ के सà¥à¤µà¤¾à¤—त की तैयारी है।”
अरà¥à¤ªà¤£ की रसà¥à¤®
तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° की सà¥à¤¬à¤¹ 'अथेनपोत काबा' से शà¥à¤°à¥‚ होती है—à¤à¤• पवितà¥à¤° चढ़ावा रसà¥à¤®, जिसे महिलाà¤à¤‚ करती हैं। वे ताजे फल, चावल, फूल और अगरबतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के साथ लैनिंगथौ सनामही और अनà¥à¤¯ देवताओं के आगे चढ़ावा चढ़ाती हैं। गृहिणी थोइबी चानू कहती हैं, “यह जैसे मेरी मां, दादी और उनसे पहले की औरतों से जà¥à¤¡à¤¼à¤¨à¥‡ जैसा है।”
पारंपरिक दावत की तैयारी
दोपहर तक रसोई सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ हो जाती है। सà¤à¥€ मिलकर तीन, पांच, सात या नौ पà¥à¤°à¤•ार के वà¥à¤¯à¤‚जन बनाते हैं—कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि विषम संखà¥à¤¯à¤¾ को समृदà¥à¤§à¤¿ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• माना जाता है।
मà¥à¤–à¥à¤¯ वà¥à¤¯à¤‚जन: उबला चावल, मौसमी सबà¥à¤œà¤¿à¤¯à¤¾à¤‚
कà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¥‡ पकोड़े: मारोई नकà¥à¤ªà¥à¤ªà¥€ के
खास चटनी: à¤à¤°à¥‹à¤®à¥à¤¬à¤¾
मिठाई: काले चावल की खीर
अनà¥à¤¯ विकलà¥à¤ª: उबला कदà¥à¤¦à¥‚ और खीरा
खास वà¥à¤¯à¤‚जन: हेई थोंगबा (हैयाई फल से बना)
पूजा के बाद à¤à¥‹à¤œà¤¨ का अरà¥à¤ªà¤£
दावत तैयार होने पर पहले देवताओं को, फिर दà¥à¤µà¤¾à¤° पर रखकर फूलों व दीपक के साथ अरà¥à¤ªà¤£ किया जाता है। केले के पतà¥à¤¤à¥‹à¤‚ में सà¤à¥€ वà¥à¤¯à¤‚जनों के नमूने रखे जाते हैं, ताकि देवता और पूरà¥à¤µà¤œ घर की रकà¥à¤·à¤¾ करें और दà¥à¤°à¥à¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ को हर लें।
मथेल लानबा: रिशà¥à¤¤à¥‹à¤‚ में मिठास घोलता है à¤à¥‹à¤œà¤¨
इसके बाद मथेल लानबा की पà¥à¤°à¤¥à¤¾ होती है—पड़ोसियों और रिशà¥à¤¤à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ के बीच वà¥à¤¯à¤‚जन बांटे जाते हैं। यह परंपरा समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ को जोड़ती है और सबको अलग-अलग सà¥à¤µà¤¾à¤¦à¥‹à¤‚ का अनà¥à¤à¤µ कराती है।
उपहारों से रिशà¥à¤¤à¥‹à¤‚ में समà¥à¤®à¤¾à¤¨
विवाहित महिलाà¤à¤‚ अपने मायके के à¤à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ और पिता को खूदेई (मैतेई पारंपरिक वसà¥à¤¤à¥à¤°) और शरà¥à¤Ÿ जैसे उपहार देती हैं। यह समà¥à¤®à¤¾à¤¨, आà¤à¤¾à¤° और पारिवारिक जà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤µ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है।
चिंग काबा: ऊंचाई की ओर नई आशा
à¤à¥‹à¤œ के बाद चिंग काबा नामक परà¥à¤µà¤¤à¥€à¤¯ चढ़ाई की जाती है। यह चढ़ाई न सिरà¥à¤« शारीरिक है, बलà¥à¤•ि आतà¥à¤®à¤¿à¤• à¤à¥€—आशाओं की ऊंचाइयों तक पहà¥à¤‚चने का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•। छातà¥à¤° निंगथेम का कहना है, “ऊपर से घाटी देखने पर जीवन की परेशानियां à¤à¥€ छोटी लगती हैं।”
परंपरा और आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता का मेल
आज के समय में परिवार सेलà¥à¤«à¥€ पोसà¥à¤Ÿ करते हैं, सोशल मीडिया पर बधाई देते हैं और पहाड़ी सà¥à¤¥à¤²à¥‹à¤‚ तक गाड़ियों से पहà¥à¤‚चते हैं, परंतॠरिवाज जैसे के तैसे हैं।
पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¸à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के लिठविरासत से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤µ
जो मणिपà¥à¤°à¥€ मणिपà¥à¤° से बाहर रहते हैं, वे à¤à¥€ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ पारà¥à¤•ों या आयोजनों के माधà¥à¤¯à¤® से यह तà¥à¤¯à¥‹à¤¹à¤¾à¤° मनाते हैं। परंपरा में आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता का समावेश इसे और वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• बनाता है।
पà¥à¤°à¤•ृति के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ आदर: सफाई अà¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤¨ और जागरूकता
कई सà¥à¤µà¤¯à¤‚सेवी समूह अब परà¥à¤µ के दौरान पहाड़ियों पर सफाई अà¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤¨ चलाते हैं। मैतेई संसà¥à¤•ृति में पà¥à¤°à¤•ृति में देवताओं का वास माना जाता है, इसलिठयह पहल परà¥à¤µ की मूल à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ के अनà¥à¤°à¥‚प है।
à¤à¤• नई शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤, à¤à¤• साथ
सजिबॠचैराओबा हमें यह सिखाता है कि नवीनीकरण सिरà¥à¤« वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त नहीं, सामूहिक यातà¥à¤°à¤¾ है। जब हम à¤à¥‹à¤œà¤¨ साà¤à¤¾ करते हैं, पहाड़ियों पर चढ़ते हैं और à¤à¤•-दूसरे से जà¥à¤¡à¤¼à¤¤à¥‡ हैं—तà¤à¥€ à¤à¤• सचà¥à¤šà¥€ नई शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ होती है। हर संसà¥à¤•ृति अपने नववरà¥à¤· में यही तलाशती है, फिर से à¤à¤• साथ शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ करने का वादा।
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
Comments
Start the conversation
Become a member of New India Abroad to start commenting.
Sign Up Now
Already have an account? Login