27 जनवरी: नà¥à¤¯à¥‚यॉरà¥à¤• से दिलà¥à¤²à¥€
मैं à¤à¤¸à¤¾ कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ कर रहा हूं? दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के बिलà¥à¤•à¥à¤² दूसरे कोने में जाकर करीब 40 करोड़ लोगों का हिसà¥à¤¸à¤¾ बनने के लिà¤, जो छह हफà¥à¤¤à¥‡ तक à¤à¤¾à¤°à¤¤ की दो पवितà¥à¤° नदियों के संगम में डà¥à¤¬à¤•ी लगाते हैं। हैरानी की बात ये है कि यहां पर हर दिन इतने लोग जà¥à¤Ÿà¤¤à¥‡ हैं, जितनी नà¥à¤¯à¥‚यॉरà¥à¤• शहर की कà¥à¤² आबादी à¤à¥€ नहीं है। दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ के लगà¤à¤— à¤à¤•-तिहाई हिंदू इस महामेले में शामिल होते हैं।
मेरे लिठयह यातà¥à¤°à¤¾ मोकà¥à¤· पाने या पापों का नाश करने के लिठनहीं है, जैसा कि कई लोग मानते हैं। मेरा मानना है कि किसी खास जगह पर पानी में डà¥à¤¬à¤•ी लगाने से इन चीजों पर कोई पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ शायद ही पड़ता हो। लेकिन कà¥à¤‚ठका हिसà¥à¤¸à¤¾ बनने का मेरा कारण बहà¥à¤¤ साधारण है। यह विशाल मानवता का à¤à¤• हिसà¥à¤¸à¤¾ बनने और आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• परंपरा से फिर से जà¥à¤¡à¤¼à¤¨à¥‡ की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ है। यह à¤à¤• अà¤à¥‚तपूरà¥à¤µ आयोजन का साकà¥à¤·à¥€ बनने और à¤à¤• साधारण नागरिक की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से इस उतà¥à¤¸à¤µ को कैमरे में कैद करने की मेरी जिजà¥à¤žà¤¾à¤¸à¤¾ है।
29 जनवरी: दिलà¥à¤²à¥€
कà¥à¤‚ठमें जाने को लेकर मन में थोड़ी घबराहट और थोड़ी आशंका है। इस वजह से नहीं कि वह à¤à¤• à¤à¥€à¤¡à¤¼à¤à¤¾à¤¡à¤¼ वाला, धूल à¤à¤°à¤¾ मेला है या हाल ही में वहां हà¥à¤ˆ à¤à¤—दड़ की घटना ने मà¥à¤à¥‡ डरा दिया है। मà¥à¤à¥‡ डर है कि कहीं जिस उमà¥à¤®à¥€à¤¦ से मैं आया था, कहीं वह अधूरी न रह जाà¤à¤‚। कà¥à¤¯à¤¾ यह अनà¥à¤à¤µ निराशाजनक होगा? लेकिन जैसा कि बाद में पता चला, ये सारी चिंताà¤à¤‚ निराधार थीं।
31 जनवरी: पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤—राज
कà¥à¤‚ठमेले के बारे में जो बात बहà¥à¤¤ से लोग नहीं जानते, वह यह है कि यहां चलना बहà¥à¤¤ पड़ता है। मेला कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के जिस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ तक वाहन जाते हैं, वहां से संगम तक पहà¥à¤‚चने के लिठà¤à¤• मील से अधिक की दूरी पैदल तय करनी होती है। दरà¥à¤œà¤¨à¥‹à¤‚ अखाड़ों के शिविरों के बीच की दूरी 2 मील से à¤à¥€ अधिक हो सकती है। मैं हर रोज 8-10 मील तक पैदल चला। मेले में घूमने का और कोई साधन नहीं है इसलिठहर दिन आप सीमित हिसà¥à¤¸à¥‡ को ही देख सकते हैं।
मेले का अधिकतर हिसà¥à¤¸à¤¾ किसी आम मेले जैसा लगता है। सड़क किनारे रà¥à¤¦à¥à¤°à¤¾à¤•à¥à¤· की माला से लेकर खिलौने और बरà¥à¤¤à¤¨à¥‹à¤‚ तक सब कà¥à¤› बिकता है। à¤à¥€à¤¡à¤¼ होती है, लेकिन असहनीय नहीं। पशà¥à¤šà¤¿à¤® से आठलोगों के लिठयह किसी बड़े मà¥à¤¯à¥‚जिक फेसà¥à¤Ÿà¤¿à¤µà¤² या वà¥à¤¯à¤¸à¥à¤¤ टाइमà¥à¤¸ सà¥à¤•à¥à¤µà¤¾à¤¯à¤° जैसा अनà¥à¤à¤µ हो सकता है।
जैसे ही आप नदी किनारे रेत पर पहà¥à¤‚चते हैं, माहौल बदल जाता है। हर हर महादेव! और जय शà¥à¤°à¥€ राम! के जयकारे गूंजने लगते हैं। रेत पर कदम रखते ही माहौल में उतà¥à¤¸à¤µ का à¤à¤¾à¤µ महसूस होता है। हवा में ठंडक, नमी और सरकंडों की हलà¥à¤•ी सी सà¥à¤—ंध घà¥à¤²à¥€ रहती है। जब मà¥à¤à¥‡ à¤à¤¹à¤¸à¤¾à¤¸ हà¥à¤† कि मैं आखिरकार संगम के पास पहà¥à¤‚च चà¥à¤•ा हूं, तो मेरी आंखें नम हो गईं। यह पल मेरी उमà¥à¤®à¥€à¤¦à¥‹à¤‚ से कहीं अधिक à¤à¤¾à¤µà¥à¤• था।
1 फरवरी: पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤—राज
इतनी जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ à¤à¥€à¤¡à¤¼ के बावजूद मेले के मà¥à¤–à¥à¤¯ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° की साफ-सफाई तारीफ के काबिले है। हालांकि इसे पूरी तरह से सà¥à¤µà¤šà¥à¤› कहना सही नहीं होगा। हर शाम कई घाटों पर आरती होती है। मैंने अरैल घाट पर परमारà¥à¤¥ निकेतन की आरती में हिसà¥à¤¸à¤¾ लिया। à¤à¤œà¤¨ गाने के बाद साधà¥à¤µà¥€ à¤à¤—वती ने हिंदी और अंगà¥à¤°à¥‡à¤œà¤¼à¥€ में परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ संरकà¥à¤·à¤£ और सà¥à¤µà¤šà¥à¤› कà¥à¤‚ठके संदेश को आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤•ता से जोड़ते हà¥à¤ समà¤à¤¾à¤¯à¤¾à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पà¥à¤²à¤¾à¤¸à¥à¤Ÿà¤¿à¤• का उपयोग कम करने की अपील की। मैंने सोचा, इतने बड़े मेले में बाहरी शांति की अपेकà¥à¤·à¤¾ करना कठिन है इसलिठयह शांति शायद आंतरिक अनà¥à¤à¤µ से ही संà¤à¤µ हो सकती है।
2 फरवरी: पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤—राज
इस दिन मैंने जूना अखाड़े के शिविर का दौरा किया और कई साधà¥à¤“ं के साथ समय बिताया। à¤à¤²à¥‡ ही इनका सà¥à¤µà¤°à¥‚प कà¤à¥€-कà¤à¥€ डरावना लगे, लेकिन इनका सà¥à¤µà¤à¤¾à¤µ बहà¥à¤¤ शांत और सरल था। खासकर रà¥à¤¦à¥à¤°à¤¾à¤•à¥à¤· बाबा के पास बैठकर शिव à¤à¤œà¤¨ गाते समय à¤à¤• अनोखी शांति का अनà¥à¤à¤µ हà¥à¤†à¥¤ कई लोग आशीरà¥à¤µà¤¾à¤¦ लेने और सिर पर मोरपंख से सà¥à¤ªà¤°à¥à¤¶ कराने के बाद आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन मेरे लिठइन साधà¥à¤“ं के पास बैठकर उनके जीवन को करीब से देखना कहीं अधिक महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ था।
3 फरवरी: पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤—राज
आज कà¥à¤‚ठको अलविदा कहने का दिन है। यह आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• उतà¥à¤¥à¤¾à¤¨ और उतà¥à¤¸à¤µ का अनà¥à¤à¤µ था। लगातार चलते रहना शारीरिक रूप से थका देने वाला था, लेकिन इसका अपना महतà¥à¤µ है। यह देखना पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤¦à¤¾à¤¯à¤• था कि कैसे सीमित संसाधनों वाले लोग à¤à¥€ इतनी लंबी यातà¥à¤°à¤¾ करके महज कà¥à¤› कà¥à¤·à¤£à¥‹à¤‚ के सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ और धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ के लिठयहां आते हैं। यही वह निरंतर मानव धारा है जो कà¥à¤‚ठमेले को इतना विशाल और विशेष बनाती है।
(लेखक हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन में सीनियर डायरेकà¥à¤Ÿà¤° (कमà¥à¤¯à¥à¤¨à¤¿à¤•ेशंस) हैं।)
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