1699 की वैशाखी का दिन शà¥à¤°à¥€ आनंदपà¥à¤° साहिब में विशà¥à¤µ धरà¥à¤® के इतिहास में à¤à¤• महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ बन गया। इसी पावन दिन दसवें सिख गà¥à¤°à¥, सरà¥à¤µà¤‚सदानी शà¥à¤°à¥€ गà¥à¤°à¥ गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की, जिसने मानवता के आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• और सामाजिक इतिहास में कà¥à¤°à¤¾à¤‚तिकारी बदलाव लाया।
खालसा की रचना, सिख कौम के लिठगौरवगाथा है। यह पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• सिख के à¤à¥€à¤¤à¤° à¤à¤• अदà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ और संपà¥à¤°à¤à¥ पहचान का à¤à¤¾à¤µ जागà¥à¤°à¤¤ करता है। खालसा वह आदरà¥à¤¶ मानव है, जो समाज के लिठपà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤¤ है और अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯ व à¤à¥‚ठके खिलाफ à¤à¤• मजबूत आवाज़। इस दिवà¥à¤¯ सà¥à¤µà¤°à¥‚प में दसों गà¥à¤°à¥à¤“ं की शिकà¥à¤·à¤¾à¤“ं का सार समाहित है।
गà¥à¤°à¥ नानक देव जी ने कहा था:
"यदि तू पà¥à¤°à¥‡à¤® खेळण का चाओ रखदा है,
ते सिर धर तली गल मेरी आवे।" (SGGS 1410)
गà¥à¤°à¥ नानक देव की यह वाणी आतà¥à¤®à¤¬à¤²à¤¿à¤¦à¤¾à¤¨ की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ देती है। समय के साथ आने वाले गà¥à¤°à¥à¤“ं ने इसी संदेश को सिख संगत में गहराई से उतारा। और अंततः वैशाखी 1699 को, गà¥à¤°à¥ गोबिंद सिंह जी ने अमृत पान की परंपरा दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ खालसा की विधिवत सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की।
इस दिन पांच पà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥‡, जिनका चयन सà¥à¤µà¤¯à¤‚ गà¥à¤°à¥ ने किया, अमृत के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤à¥¤ फिर वही गà¥à¤°à¥ गोबिंद सिंह जी—जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अमृत दिया था—उनà¥à¤¹à¥€à¤‚ पांचों से अमृत लेकर यह दरà¥à¤¶à¤¾à¤¯à¤¾ कि गà¥à¤°à¥ और शिषà¥à¤¯ में कोई à¤à¥‡à¤¦ नहीं है। à¤à¤¾à¤ˆ गà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¸ जी ने लिखा: "वाह-वाह गोबिंद सिंह, आपे गà¥à¤°à¥ चेला।"
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इस दिन खालसा ने अतà¥à¤¯à¤¾à¤šà¤¾à¤°, à¤à¥‡à¤¦à¤à¤¾à¤µ, अनà¥à¤¯à¤¾à¤¯ और असतà¥à¤¯ के विरà¥à¤¦à¥à¤§ आवाज़ उठाने की शपथ ली। खालसा केवल à¤à¤• धारà¥à¤®à¤¿à¤• संसà¥à¤¥à¤¾ नहीं, बलà¥à¤•ि à¤à¤• जीवन दरà¥à¤¶à¤¨ है—जो केवल à¤à¤• अकाल पà¥à¤°à¤– को मानता है, à¤à¥‚ठ-धोखे से दूर रहता है और पाà¤à¤š ककारों—केश, कृपाण, कड़ा, कंघा, और कछैरा—की मरà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ में जीता है।
खालसा का जीवन à¤à¤• सचà¥à¤šà¥‡ संत-सिपाही का जीवन है। सेवा, साहस, सतà¥à¤¯ और शहादत उसके जीवन मूलà¥à¤¯ हैं। खालसा वह शकà¥à¤¤à¤¿ है जो अतà¥à¤¯à¤¾à¤šà¤¾à¤° के विरà¥à¤¦à¥à¤§ खड़ी होती है और पीड़ितों के साथ रहती है।
आज के यà¥à¤— में, जब तकनीक और सूचना की पà¥à¤°à¤—ति से नैतिक मूलà¥à¤¯ छूटते जा रहे हैं, à¤à¤¸à¥‡ समय में खालसा की विचारधारा और à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤‚गिक हो गई है। सिख यà¥à¤µà¤¾à¤“ं को अपने इतिहास, विरासत और मरà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ से जोड़ना आज की महती आवशà¥à¤¯à¤•ता है। गà¥à¤°à¤¬à¤¾à¤£à¥€ और गà¥à¤°à¤®à¤¤ का पालन ही सचà¥à¤šà¥€ खालसाई जीवनशैली है।
आज खालसा सृजन दिवस के अवसर पर हम सब संकलà¥à¤ª लें— कि हम अमृतधारी बनें, गà¥à¤°à¥à¤“ं की राह पर चलें, और "à¤à¤• पिता à¤à¤•स के हम बालक" के संदेश को अपनाते हà¥à¤ संपूरà¥à¤£ मानवता की सेवा करें।
गà¥à¤°à¥ नानक साहिब के पंथ को मानने वाले सà¤à¥€ शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾à¤²à¥à¤“ं को खालसा सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ दिवस की हारà¥à¤¦à¤¿à¤• बधाई।
-लेखक: अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤·, शिरोमणि गà¥à¤°à¥à¤¦à¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पà¥à¤°à¤¬à¤‚धक कमेटी, शà¥à¤°à¥€ अमृतसर
(इस लेख में वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ विचार लेखक के निजी हैं, और जरूरी नहीं कि New India Abroad की आधिकारिक नीति या मत को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥‡ हों।)
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