सिनेमाई शोरगà¥à¤² और चकाचौंध के बीच कà¥à¤› फ़िलà¥à¤®à¥‡à¤‚ à¤à¤¸à¥€ आती हैं जैसे जीवन चल रहा हो साधारण रूप से। जैसी किसी की सà¥à¤‚दरता को गहने-ज़ेवर, बनाव-सजाव से लादा ना गया हो। जैसे इनकी खामोशी दूर तक नाद करती हà¥à¤ˆ मन में धंसी रहती है।
à¤à¤¸à¥€ ही à¤à¤• फ़िलà¥à¤® है “8A.M METRO”। फ़िलà¥à¤® का टà¥à¤°à¥‡à¤²à¤° देखकर ही मन कर गया था इसे देखने का, लेकिन यह zee के चैनल पर उपलबà¥à¤§ थी। ऑनलाइन कई बार सरà¥à¤š किया, पर मिली नहीं। शायद यह सरà¥à¤š का ही नतीजा था कि यह फ़िलà¥à¤® youtube के रेकà¥à¤®à¤¨à¤¡à¥‡à¤¸à¥à¤¶à¤¨ में मà¥à¤à¥‡ बीते दिनों दिखी।
कविता जैसी यह फ़िलà¥à¤® आज के जीवन के लिठबहà¥à¤¤ ज़रूरी है। वैसे तो पारिवारिक रिशà¥à¤¤à¥‡ ख़ासकर पतà¥à¤¨à¥€-पतà¥à¤¨à¥€ के रिशà¥à¤¤à¥‹à¤‚ पर कई फ़िलà¥à¤®à¥‡à¤‚ बन चà¥à¤•ी हैं। उनमें बासॠà¤à¤Ÿà¥à¤Ÿà¤¾à¤šà¤°à¥à¤¯à¤¾ के निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤¨ में कà¥à¤› ख़ूबसूरत फ़िलà¥à¤®à¥‡à¤‚ बनीं। लेकिन यह उन सब फ़िलà¥à¤®à¥‹à¤‚ से अलग है। à¤à¤• किताब की तरह आपको अपनी बात समà¤à¤¾à¤¤à¥€ जाती है।
फ़िलà¥à¤® के पातà¥à¤° दूसरे लोगों की मदद करते हैं जबकि उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ ख़à¥à¤¦ मदद की ज़रूरत है। कौन सा इंसान किस पीड़ा से घिरा है, यह कोई कैसे मà¥à¤–ौटे के पीछे से जान सकता है? सामजिक परिवेश ही कà¥à¤› à¤à¤¸à¤¾ बन सा गया है कि लगà¤à¤— सबको जज होने का à¤à¤¯ समाया रहता है। कोई कà¥à¤¯à¤¾ कहेगा, इस फेर में ख़à¥à¤¦ से दूर होते लोग मानसिक बीमार होते चले जाते हैं। à¤à¤¸à¥‡ में अचानक कोई मन लायक़ साथी मिल जाठतो वह à¤à¥€ à¤à¤• समय में ख़à¥à¤¦ के सà¥à¤µà¥€à¤•ारने से ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ समाज को सà¥à¤µà¥€à¤•ार होगा कि नहीं की बलि चढ़ जाता है।
फ़िलà¥à¤® में कई ख़ूबसूरत कविताà¤à¤‚ हैं। फ़à¥à¤°à¥‡à¤‚ज काफ़à¥à¤•ा की à¤à¤• कहानी का à¤à¥€ ज़िकà¥à¤° है, पर मूल बात यह है कि अगर किसी किताब के à¤à¤•-दो पनà¥à¤¨à¥‡ ठीक नहीं लगें तो इसका मतलब यह नहीं कि वह पूरी किताब ही ख़राब है। यही बात इंसानों पर à¤à¥€ लागू होती है।
हमारे पास सब कà¥à¤› होता है, फिर à¤à¥€ हम बाहर चीजों को ढूंढते रहते हैं। कहते हैं ना कि आसानी से मिलने वाली चीज़ों की हम समय पर कदà¥à¤° नहीं करते। और फिर उनके ना होने पर पीछे मà¥à¤¡à¤¼à¤•र देखने पर समठआता है कि जीवन इतना à¤à¥€ बà¥à¤°à¤¾ नहीं था। बस देखने, महसूस करने का नज़रिया सही नहीं था।
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