कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ कीजिठà¤à¤¾à¤°à¤¤ के उस कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° की, जिसे यूनानी और रोमन नाविक कà¤à¥€ उपजाऊ à¤à¥‚मि और लंबे-चौड़े लोगों के लिठजाना करते थे। यही वह धरती है जहां à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ नेता पैदा हà¥à¤†, जिसने बà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ शासन को उखाड़ फेंकने और à¤à¤¾à¤°à¤¤ को सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° कराने के आंदोलन का नेतृतà¥à¤µ किया। à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ मंदिर जो सात बार तोड़ा गया और हर बार फिर से खड़ा हà¥à¤†, मानो अपने असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ की घोषणा करता हो। यही नहीं, à¤à¤¶à¤¿à¤¯à¤¾à¤ˆ शेरों का अंतिम पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक निवास और अफà¥à¤°à¥€à¤•ी मूल के लोगों का à¤à¤• गांव à¤à¥€ यहीं सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। यह कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° है – गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ का सौराषà¥à¤Ÿà¥à¤°, जिसे काठियावाड़ à¤à¥€ कहते हैं।
राजकोट में बचपन बिताने के बाद मैं (लेखक-राम केलकर) हाल ही में जब फिर से सौराषà¥à¤Ÿà¥à¤° पहà¥à¤‚चा, तो यह यातà¥à¤°à¤¾ मेरे लिठयादों को फिर से जीने जैसी थी। मैंने अपने पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ घर और सà¥à¤•ूल का दौरा किया – वही अलà¥à¤«à¥à¤°à¥‡à¤¡ हाई सà¥à¤•ूल, जहां कà¤à¥€ मोहनदास करमचंद गांधी à¤à¥€ पढ़ा करते थे। आज यह विदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ ‘गांधी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ संगà¥à¤°à¤¹à¤¾à¤²à¤¯’ में बदल चà¥à¤•ा है। इस à¤à¤µà¤¨ का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ जूनागढ़ के नवाब ने कराया था और इसका उदà¥à¤˜à¤¾à¤Ÿà¤¨ बॉमà¥à¤¬à¥‡ पà¥à¤°à¥‡à¤¸à¤¿à¤¡à¥‡à¤‚सी के गवरà¥à¤¨à¤° सर फिलिप वà¥à¤¡à¤¼à¤¹à¤¾à¤‰à¤¸ ने किया था, जो पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ लेखक पीजी वà¥à¤¡à¤¼à¤¹à¤¾à¤‰à¤¸ के रिशà¥à¤¤à¥‡à¤¦à¤¾à¤° थे।
यह संगà¥à¤°à¤¹à¤¾à¤²à¤¯ गांधी जी के जीवन की यातà¥à¤°à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¤¾ है – दकà¥à¤·à¤¿à¤£ अफà¥à¤°à¥€à¤•ा में उनके शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤à¥€ संघरà¥à¤· से लेकर à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ में उनकी à¤à¥‚मिका और 1948 में हà¥à¤ˆ उनकी दà¥à¤–द हतà¥à¤¯à¤¾ तक।
राजकोट के पास सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ जूनागढ़ शहर इतिहास की अनमोल परतें समेटे हà¥à¤ है। यहां मौरà¥à¤¯ काल में बना à¤à¤• किला है, जिसमें अदà¥à¤à¥à¤¤ ‘आदि कड़ी वाव’ नामक सीढ़ीदार बावड़ी सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। मराठा महासंघ का हिसà¥à¤¸à¤¾ रह चà¥à¤•ा जूनागढ़ बाद में बà¥à¤°à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤¶ ईसà¥à¤Ÿ इंडिया कंपनी का संरकà¥à¤·à¤¿à¤¤ राजà¥à¤¯ बना। यहीं के दीवान रहे शाहनवाज़ à¤à¥à¤Ÿà¥à¤Ÿà¥‹ (पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ के पूरà¥à¤µ पà¥à¤°à¤§à¤¾à¤¨à¤®à¤‚तà¥à¤°à¥€ जà¥à¤²à¥à¤«à¤¿à¤•ार अली à¤à¥à¤Ÿà¥à¤Ÿà¥‹ के पिता) ने 1947 में जूनागढ़ को पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ में मिलाने का निरà¥à¤£à¤¯ लिया था, जिसे सरदार वलà¥à¤²à¤à¤à¤¾à¤ˆ पटेल ने उलट दिया।
गिर और जामà¥à¤¬à¥‚र: जहां शेर और अफà¥à¤°à¥€à¤•ी विरासत जिंदा है
सौराषà¥à¤Ÿà¥à¤° के ही गिर राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ उदà¥à¤¯à¤¾à¤¨ में पाठजाते हैं विशà¥à¤µ में बचे हà¥à¤ अंतिम à¤à¤¶à¤¿à¤¯à¤¾à¤ˆ शेर। यहां लगà¤à¤— 600 से अधिक शेर पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक रूप से विचरण करते हैं। गिर के पास ही जामà¥à¤¬à¥‚र नामक à¤à¤• गांव है, जहां के लोग अफà¥à¤°à¥€à¤•ी वंश के हैं। हालांकि वे गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤à¥€ बोलते हैं और पूरी तरह à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ जीवन जीते हैं, लेकिन माना जाता है कि उनके पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ को अरब वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¾à¤°à¥€ या पà¥à¤°à¥à¤¤à¤—ाली उपनिवेशवादी à¤à¤¾à¤°à¤¤ लाठथे।
सोमनाथ मंदिर: आसà¥à¤¥à¤¾ की अमर गाथा
अरब सागर के किनारे सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ सोमनाथ मंदिर का इतिहास à¤à¤¾à¤°à¤¤ के अदमà¥à¤¯ साहस और शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾ की मिसाल है। इस मंदिर को 1026 में महमूद गजनवी, 1299 में उलà¥à¤— खान, 1395 में मà¥à¤œà¤«à¥à¤«à¤° शाह और 1706 में औरंगज़ेब ने धà¥à¤µà¤¸à¥à¤¤ किया। फिर à¤à¥€ यह हर बार बना – कà¤à¥€ चालà¥à¤•à¥à¤¯ राजा कà¥à¤®à¤¾à¤°à¤ªà¤¾à¤² ने, तो कà¤à¥€ मराठा रानी अहिलà¥à¤¯à¤¾à¤¬à¤¾à¤ˆ होलà¥à¤•र ने इसे पà¥à¤¨à¤°à¥à¤œà¥€à¤µà¤¿à¤¤ किया।
à¤à¤¾à¤°à¤¤ के सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° होने के बाद सरदार पटेल ने इसके पà¥à¤¨à¤°à¥à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤®à¤¾à¤£ की योजना को सà¥à¤µà¥€à¤•ृति दी। जूनागढ़ के à¤à¤¾à¤°à¤¤ में विलय के बाद उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने खंडहर में तबà¥à¤¦à¥€à¤² हो चà¥à¤•े सोमनाथ मंदिर को देखकर इसका पà¥à¤¨à¤°à¥à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बाइबिल का हवाला देते हà¥à¤ कहा, “मैं नषà¥à¤Ÿ करने नहीं, बलà¥à¤•ि पूरा करने आया हूं”।
गिरनार और अशोक के शिलालेख
जूनागढ़ के निकट गिरनार परà¥à¤µà¤¤ के तल में समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अशोक दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ शिलालेख आज à¤à¥€ संरकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हैं। इनमें से à¤à¤• में लिखा है – “अपने धरà¥à¤® को ऊंचा दिखाने के लिठदूसरों के धरà¥à¤® को नीचा दिखाना, अपने धरà¥à¤® को सबसे बड़ा नà¥à¤•सान पहà¥à¤à¤šà¤¾à¤¨à¤¾ है।” यह संदेश 2300 साल पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¤¾ होते हà¥à¤ à¤à¥€ आज की धारà¥à¤®à¤¿à¤• सहिषà¥à¤£à¥à¤¤à¤¾ का सबसे बड़ा पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ है।
सौराषà¥à¤Ÿà¥à¤° केवल à¤à¤• à¤à¥‚गोलिक कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° नहीं, बलà¥à¤•ि à¤à¤¾à¤°à¤¤ के सांसà¥à¤•ृतिक, à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• और आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की जीवंत à¤à¤²à¤• है। यहां की यातà¥à¤°à¤¾ अतीत से जà¥à¤¡à¤¼à¤¨à¥‡, अपनी जड़ों को पहचानने और à¤à¤¾à¤°à¤¤ को नठसिरे से देखने का अवसर देती है – यह वासà¥à¤¤à¤µ में “à¤à¤¾à¤°à¤¤ की पà¥à¤¨à¤°à¥à¤–ोज” है।
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